महुआ के पेड़ : अमृत या ज़हर

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प्रकृति ने मानव के पोषण के लिए प्रचुर मात्रा में विविध संसाधन दिए हैं। वेदिक काल में जिस सोम रस उल्लेख मिलता है , आठवीं सदी में एक धर्म विशेष के प्रभाव से उसका सेवन हराम हो गया था , सोम रस का पौधा , हिंदू कुश से पामीर के इलाक़े में ही होता था , तब इसके विकल्प की तलाश में समुदायों ने और चिकित्सकों ने देश के दूरस्थ इलाक़ों में खोज शुरू की ।
कोईतूर ( ग़ोंड़ : पहाड़ी योद्धा ) समाज , जो की सतपुरा की पहाड़ियों से दक्षिण में गोदावरी के मुहाने तक फैला हुआ था , अपने देवताओं के लिए , एक विशेष प्रकार के द्रव्य का उत्पादन करते थे , शायद दुनिया में “ फ़र्मेंट “ करके शराब बनाने की ये पहली खोज थी , और मान्यताओं की माने तो ये विधि उन्हें “ शिव “ से सीधे प्राप्त हुई थी ।
इस द्रव्य को महुआ के फूल से बनाया जाता था , महुआ जो की इनकी भोजन शृंखला का महत्वपूर्ण अंग था , और गुड का विकल्प था ।
इस महुआ से बनी शराब को , ख़रीदने और व्यवसाय करने एक विशेष समुदाय ने रुचि दिखाई , जिन्हें “ कलचुरी “ “ कल अर्थात शराब चुरि अर्थात बनाना या व्यवसाय : ग़ोंडी भाषा में “ ।
लगभग दो सौ वर्षों में , इस द्रव्य की विधि और इनके कच्चे माल के लिए , कोईतूर ( ग़ोंड़ ) लोगों के परम्परागत “ महुआ “ क्षेत्र में काफ़ी अतिक्रमण हुए , महुआ से बनी शराब के व्यवसाय में लगे कलचुरी समाज ( कलार ) आज भी इसके उत्पादन और वितरण में संलग्न हैं ।
लगभग चार सौ वर्षों तक , महुआ व्यवसाय के कारण , आर्थिक परेशानियों को झेलने के बाद , कोईतूर ( ग़ोंड़ ) समुदाय ने सत्ता संघर्ष किया और , 11 वीं सदी के आस पास सतपुरा से लेकर गोदावरी के डेल्टा तक , नागवंशी शाखा के कोईतूर ( ग़ोंड़ ) राजाओं ने वापस सत्ता अपने हाँथ में ले ली , जो मुग़ल और अंग्रेज़ों के आने तक यथावत बनी रही ।
आज महुआ से बनी शराब ने पीढ़ियों को इसका ग़ुलाम बना दिया है , जो पेय द्रव्य केवल देवताओं या केवल पूजन के समय उपभोग में लाने हेतु था , अथवा जिसके अल्कोहल से सर्प दंश से भी बचा जा सकता था , उसने इसे ही ज़हर बना दिया ।

* लक्ष्मण राज सिंह मरक़ाम ‘लक्ष्य ‘