इन्द्रावती नदी: बस्तर की जीवनरेखा

छत्तीसगढ़ विशेष

इंद्रावती नदी का उद्ग्म उड़ीसा राज्य में ईस्टर्न घाट के दंडकारण्य रेंज में कालाहांडी जि़ला अंतर्गत धरमगढ़ तहसील के रामपुर थूयामूल के निकट डोंगरला पहाड़ी पर 3000 फीट की ऊँचाई पर हुआ है। इंद्रावती नदी, का प्रवाह पूर्व से पश्चिम की ओर है। इंद्रावती नदी, अपने उद्गम के बाद उड़ीसा से छत्तीसगढ़ राज्य में प्रवेश करती है तथा छत्तीसगढ़ राज्य के अंतिम पश्चिमी छोर से यह दक्षिण की ओर प्रवाहित होती हुई छत्तीसगढ़-महाराष्ट्र-तेलंगाना राज्य की सीमा पर बीजापुर जिले के भद्रकाली नामक ग्राम के समीप गोदावरी नदी में मिलती है। अपने उद्गम से गोदावरी संगम तक इंद्रावती नदी 535 किमी लंबा सफऱ तय करती है, जिसमें से उड़ीसा राज्य के कालाहांडी, नवरंगपुर तथा कोरापुट जि़ले में 164 किमी, छत्तीसगढ़ व उड़ीसा राज्य सीमा पर 9.5 किमी तथा छत्तीसगढ़ राज्य के बस्तर, दाँतेवाड़ा, बीजापुर जिले में 233 किमी एवं छत्तीसगढ़-महाराष्ट्र राज्य सीमा पर 129 किमी प्रवाहित होकर गोदावरी नदी में मिलती है।
उद्ग्म से दक्षिण की ओर बहती हुई कोरापुट जिले काशीपुर तहसील से गुजर, 60 मील के घुमावदार रास्ते से नवरंगपुर जैपुर, होती हुई बस्तर की सीमा में प्रवेश करती है. बस्तर के बीचों बीच पूर्व से पश्चिम की ओर बहती हुई बस्तर हुई नदी बस्तर को दो भागों में विभक्त करती है. रास्तें में किनारे-किनारे ब रास्ते में किनारे-किनारे बेलगांव, गुगडेल, मालगांव, कुरूसपाल, धोबीगुड़ा, आसना, जगदलपुर, तितिरगांव, घाटपदमुर, टिकरालोहंगा, बाली कोंटा, कबी आसना, घाट कबाली, चोकर, मेटवाड़ा, टिकरा धनोरा, छापर भनपुरी, घाट सरगीपाल, बोडऩपाल, पलमी, चकवा, गढ़बोदरा, नारायणपाल से चीतरकोट पहुंचती है जहां एक सुंदर जलप्रपात का निर्माण करती है बस्तर की जीवनदायनी इंद्रावती. चित्रकोट (चितरकोट) जलप्रपात से आगे बिंताभेजा होती हुई इंद्रावती दंतेवाड़ा जिले के बोधघाट, बारसूर, छिंदनार और मुस्तलनार होते हुए बीजापुर के मरकापाल, बिटियाभूस, आदि गांवों से होकर यह परकेली, कुटरू, केरकेल, मेदरीगांवों को लांघकर दक्षिण दिशा में मुड़ जाती है और करकावाड़ा पसेवाड़ा, मट्टीमारका, लिंगपुरम, देपला गावों को पार कर भोपालपट्नम, के आगे भद्रकाली और रेगुडा गावों के पास इंद्रावती गोदावरी नदी में मिल जाती है।
नदी किनारे निवासरत प्रमुख मानव समुदाय
इंद्रावती नदी के बस्तर प्रवाह क्षेत्र में मैदानी, पठारी तथा पहाड़ी क्षेत्र आते हैं। इंद्रावती नदी के बस्तर प्रवेश क्षेत्र में भतरा, हल्बा, सवरा, माहरा, पनका, कुम्हार समुदाय, मध्यवर्ती क्षेत्र में राजा मुरिया, भतरा, माडिय़ा, दंडामी माडिय़ा, हल्बा, मुंडा, कुडुख, केंवट, धाकड़, सुंडी, महारा आदि तथा मध्यवर्ती क्षेत्र से संगम तक माडिय़ा, दंडामी माडिय़ा, हल्बा, गोंड, दोरला, परधान, राजगोंड, सुंडी, कोष्ठा, केंवट, राउत, महार, तेलंगा आदि जनसमुदाय है।
नदी पर आजीविका के लिये आश्रित समुदाय
इंद्रावती नदी के मैदानी क्षेत्र में बसे में बसे भतरा, हल्बा, मुरिया आदि समुदाय की आजीविका कृषि है।
इंद्रावती नदी के किनारे निवासरत कुडुख व केंवट समुदाय की आजीविका नदी पर आश्रित है। इन परिवारों के सदस्य का मुख्य कार्य नाव चलाना तथा मछली मारना है। वे छोटी-छोटी डोंगियों पर ग्रामीणों को नदी पार कराते हैं व पारिश्रमिक प्राप्त करते हैं। इसी प्रकार अनेक समुदाय के स्त्री-पुरूष मछली मारने का कार्य करते हैं।
जलप्रपात
इंद्रावती नदी, बस्तर जिला मुख्यालय से पश्चिम दिशा में 40 किमी दूरी पर चित्रकोट नामक स्थल पर 96 फीट ऊँचे, विशाल जलप्रपात का आकार घोड़े की नाल के समान है। नियाग्रा जलप्रपात के सदृश के कारण इसे ‘भारत का नियाग्राÓ कहा जाता है। राज्य का सबसे बड़ा, सबसे चौड़ा तथासर्वाधिक जलप्रवाहित करने वाला जलप्रपात है।
विकासीय परिदृश्य
दांतेवाड़ा जिले के बारसूर क्षेत्र में इंद्रावती नदी पर ‘बोधघाट परियोजनाÓ नामक एक वृहत बाँध परियोजना का निर्माण किया जा रहा था, किंतु पर्यावरण संबंधी आपत्तियों के कारण इसे रोक दिया गया है। बस्तर जिले के जगदलपुर के समीप इंद्रावती नदी के किनारे नगरनार में एन.एम.डी.सी. (हृड्डह्लद्बशठ्ठड्डद्य रूद्बठ्ठद्गह्म्ड्डद्य ष्ठद्ग1द्गद्यशश्चद्वद्गठ्ठह्ल ष्टशह्म्श्चशह्म्ड्डह्लद्बशठ्ठ) द्वारा वृहत् स्टील प्लांट स्थापित किया जा रहा है। इंद्रावती नदी के जल संसाधन के उपयोग हेतु उड़ीसा राज्य में खातीगुड़ा बाँध बनाया गया है। इसे सतत प्रवाहमान बनाये रखने, सिंचाई सुविधाओं के विकास, जलापूर्ति तथा भूजल स्तर को बनाये रखने के उद्देश्य से नगरनार से चित्रकोट तक नौ एनीकट का निर्माण किया गया है। यातायात सुविधाओं के विकास के लिये इंद्रावती नदी पर अनेक पुलों का निर्माण किया गया है।
इंद्रावती के उत्तरी सहायक नदियों में कोतरी, भॅवरडींग, गुदरा, गोस्देव, निबरा और नांटगी प्रमुख है. कोसरी नदी राजनांदगांव जिले की पाना बदरू जमींदारी की एक पहाड़ी से निकली है. बालेर, चारगांव, खंडी, मातलाघाट, रावघाट और कोतली की सहायक नदियां है कोतरी और निबरा नारायणपुर के पश्चिमी सीमान्त में इंद्रावती से मिलती है, मुंडरा नदी अबुझमाड़ के दक्षिणी भाग से निकलकर मुला गोटाल, फरसपाल, बड़दाल, छोटेडोंगर होती हुई बीजापुर तहसील में कोसलनार के पास इंद्रावती में मिल जाती है. नारंगी भी बस्तर की एक प्रमुख नदी है. कोंडागांव माकड़ी गांव की पहाड़ी से निकलकर चित्रकोट जलप्रपात के कुछ ही उपर बोदरा के पास इंद्रावती में मिल गई है. मारकंडेय नदी नारंगी की प्रमुख सहायक नदी है.
इद्रावती की दक्षिणी सहायक नदियों में डंकिनी, संखिनी, बेंरूदी मांडेर और चिंतावागू प्रमुख है. खोपाल – शबरी की एक महत्वपूर्ण नदी है उडि़सा के क ोरापुट पठार से निकलकर कोंटा के आगे गोदावरी में मिल जाती है. मलवेर, चिंतलनार, चिंतावागु शबरी की सहायक नदियां है.
संकट
वर्तमान में उडीसा-छत्तीसगढ़ सीमा के समीप प्रवाहित जोरा नाला के कारण इंद्रावती नदी का अस्तित्व संकट में है। जिसके कारण इंद्रावती नदी का जल सबरी नदी में प्रवाहित हो रहा है। इससे ग्रीष्मकाल में इसका सतत प्रवाह खंडित हो जाता है। रेत उत्खनन, तट पर शवदाह, गंदगी, कचरा फेंकने, प्रदूषित व गंदे जल की निकासी व निरंतर बढ़ते प्रदूषण के कारण नदी अपने स्वरूप को खो रही है।
छत्तीसगढ़ और ओडिशा के बीच इंद्रावती नदी पर पानी के हक के लिए चल रहे विवाद के बावजूद अब तक कोई निर्णायक फैसला न आने की वजह बस्तर में ग्रीष्म ऋ तु में इंद्रावती नदी सूख जाती है। इन दिनों विश्व प्रसिद्ध प्रपात में गिरने वाला पानी पूरी तरह से गिरना बंद ही हो गया है इंद्रावती जल संकट पर निर्णायक उपाय की माँग के साथ ही बस्तर की पर्यटन एवं संस्कृति के क्षेत्र में काम करने वाली अग्रणी संस्था दंडक दल ने आंदोलन शुरू किया है।

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