कुल्हाड़ीघाट पर फिर पड़ी सरकार की नज़र

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राजीव गांधी को कंद मूल खिलाने वाली बल्दीबाई को दिया जाएगा पक्का मकान


राजीव गांधी 17 जुलाई 1985 को कुल्हाड़ीघट आए थे, उसी समय उन्होंने ग्राम को गोद लेने का ऐलान किया था। उनके साथ अविभाजित मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मोतीलाल वोरा भी थे। कुल्हाड़ीघाट की अधोसंरचना में विकास तो हुआ पर जिस बल्दी बाई ने राजीव को कंदमूल खिलाए थे वो महिला आज भी झोपड़ी में रहती है। 34 साल बाद अब जब प्रदेश में कांग्रेस की सरकार  बनी है, कुल्हाड़ीघाट के लोगों में फिर विकास में तेजी आने की उम्मीद बंधी है ।
गरियाबंद जिला मुख्यालय से लगभग 65 से 70 किलोमीटर की दूर वनांचल ऊंचाई पर बसा आदिवासी कमार जनजाति ग्राम कुल्हाड़ीघाट आजादी के 60 दशक बाद भी मूलभूत सुविधाओं के लिए मोहताज है। इस ग्राम की जनसंख्या लगभग 1500 है। इस ग्राम को पूर्व प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी ने गोद लिया था तब से आज राजीव गांधी गोद ग्राम के नाम से जाना जाता है। गांव से लगभग तीन किमी की दूर पर पहाड़ी में प्रकृति द्वारा निर्मित कुल्हाड़ी के आकार का एक विशाल चट्टान है जिसके नाम पर यह गांव का नाम कुल्हाड़ीघाट के नाम से जानने लगे।

कुल्हाड़ी घाट ग्राम पंचायत में 11 आश्रित गांव हैं। यहां मुख्य रूप कमार जनजाति निवास करती है। जिन्हें विशेष पिछड़ी जनजाति में शामिल किया गया है। यहां के लोगों का जीवकोपार्जन का एक मात्रसाधन वनोपज है। दो वक्त की रोटी की जुगत में कमार जनजाति तेंदू, कांदा, महुआ, तेंदूपत्ता, बांस से बर्तन बनाते हैं। इसके अलावा ये थोड़ी-बहुत खेती भी करते हैं जो नहीं के बराबर है क्योंकि सिंचाई के साधनों का अभाव है। ये जनजाति बांस बर्तन बनाने के कामों में महारथ है अगर बांस बर्तन बनाने के लिए आधुनिक तरीकों के साथ प्रशिक्षित कर एक उद्योग केन्द्र खोला जाए तो निश्चित ही एक अच्छा आय के साथ इनके जीवन स्तर में बदलाव हो सकता है।

जब बल्दीबाई ने अपने हाथों से खिलाया कंदमूल

ग्राम पंचायत कुल्हाड़ीघाट का मुख्यालय कुल्हाड़ीघाट में ही स्थित है. यह वहीं गांव हैं जहां देश के पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी सन् 1984 में अपनी पत्नि सोनिया गांधी के साथ हेलीकाॅप्टर से पहुंचे थे. तब से कुल्हाड़ीघाट को एक नई पहचान मिली है. गांव की महिला बल्दी बाई ने अपने हाथों से राजीव गांधी को कंदमूल व तेंदूफल खिलाकर जैसे शबरी की भूमिका निभाई थी. आज लगभग 90 वर्ष की हो चुकी बल्दी बाई उन दिनों को याद करके चहक उठती है. उनकी चेहरे की झुर्रियों में चमक आ जाती है. वे बताती है कि उन्हें और उनके परिवार को शासन की पेंशन, राशन कार्ड, वन अधिकार पत्र एवं आवास योजना के तहत लाभ मिला है.

विषम परिस्थितियों में विकास की ललक

हरियाली और पहाड़ियों से घिरा कुल्हाड़ीघाट में प्रचुर प्राकृतिक संसाधन है. समीप में ही मनोहारी देवधारा जलप्रपात बहती है. घने जंगल और सीमावर्ती क्षेत्र होने के कारण यह वामपंथ उग्रवाद का दंश भी झेल रहा है. शासन और जिला प्रशासन द्वारा कुल्हाड़ीघाट के विकास के लिए अनेक विकासीय कार्य स्वीकृत किये गये हैं. फलस्वरूप आज कुल्हाड़ीघाट की तस्वीर बदलने लगा है. एक समय जहां कच्ची पगडंडी रास्तों से होकर जाना पड़ता था, वहीं आज कुल्हाड़ीघाट तक पक्की सड़के बन गई है. आश्रित ग्राम कठवा, गंवरमुंड, बेसराझर, भालुडिग्गी एवं देवडोंगर में भी पहुंच मार्ग से आ-जा सकते है. पंचायत में अधोसंरचना विकास के  कुल्हाड़ीघाट  साथ-साथ मानव संसाधन विकास के उल्लेखनीय कार्य किये गये हैं

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