कैसे बनता है आम बजट?

अर्थव्यवस्था

क्या होता है केंद्र सरकार का आम बजट?
वित्त मंत्री संसद में एक सालाना विवरण पेश करते हैं जिसमें ये बताया जाता है कि आने वाले वित्त वर्ष में सरकार कितने पैसे जुटाने की उम्मीद करती है औऱ उसे वो कैसे खर्च करेगी. इस बयान को केंद्रीय बजट कहा जाता है. बजट दस्तावेजों में क्या होता है?
बजट में सरकारी खर्च को कैसे बांटा जाता है?
सरकारी खर्च को बांटने के दो तरीके इस्तेमाल किए जाते हैं
1. योजनागत बनाम गैर-योजनागत
2. पूंजीगत बनाम राजस्व
पूंजीगत खर्च-संपत्ति बनाने या देनदारियों कम करने के इस्तेमाल में किया गया खर्च पूंजीगत खर्च होता है. मसलन सड़क निर्माण में किया जानेवाला खर्च.
राजस्व खर्च- वो खर्च जिससे कोई संपत्ति नहीं बनती जैसे सैलेरी या दूसरे प्रशासनिक खर्चों को राजस्व खर्च कहते हैं.
योजनागत खर्च- पंचवर्षीय योजनाओं के तहत आने वाली स्कीम और परियोजनाएं इस मद के तहत आती हैं. इस तरह की योजनाएं हर मंत्रालय से बातचीत करने के बाद अब तक योजना आयोग बनाता था. मसलन मिड डे मील और सर्व शिक्षा अभियान जैसे कार्यक्रम पर कैसे और कितना खर्च होगा वगैरह, वगैरह. लेकिन हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने योजना आयोग को खत्म कर नया नीति आयोग बनाया है. नीति आयोग के पास फंड का बंटवारा करने और नीतियां लागू करवाने का अधिकार नहीं होगा. वो सिर्फ सुझाव दे सकता है. योजनागत खर्च में राजस्व और पूंजीगत दोनों तरह के खर्च हो सकते हैं. उदाहरण के लिए, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत प्रशासनिक खर्च को राजस्व खर्च में रखा जा सकता है और इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने के वास्तविक खर्च को पूंजीगत खर्च के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है.
गैर-योजनागत खर्च- ये वो खर्च है जो किसी योजना के तहत नहीं किया जाता. दरअसल सरकार चलाने के जो खर्च हैं वो इस मद में आते हैं. स्कूल, अस्पताल, न्यायपालिका, पुलिस जैसी संस्थाओं को चलाने का खर्च, कर्ज का ब्याज चुकाने जैसे खर्च, गैर-योजनागत खर्च के तहत आते हैं. इसमें भी खर्च का बंटवारा राजस्व और पूंजीगत तौर पर किया जा सकता है.
राजस्व आय- मुख्य तौर पर टैक्स, कंपनियों के डिविडेंड और सरकारी सेवाओं के बदले जनता से मिले पैसे राजस्व आय के दायरे में आते हैं.
पूंजीगत आय- मुख्य तौर पर केंद्र सरकार का अलग-अलग स्रोतों ( भारतीय और विदेशी) से लिया हुआ कर्ज, राज्य सरकार का लौटाया हुआ कर्ज और सरकारी कंपनियों के विनिवेश से मिलने वाला धन इस श्रेणी में आता है.
राजकोषीय घाटा क्या होता है?
सरकार का कुल खर्च जब कुल कमाई से ज्यादा हो जाए तो खर्च की उस अतिरिक्त रकम को राजकोषीय घाटा कहते हैं. सरकार ये कमी कर्ज लेकर पूरा करती है.
बजट कैसे तैयार किया जाता है?
बजट वित्त मंत्रालय के बजट विभाग के द्वारा तैयार किया जाता है. बजट अन्य मंत्रालयों और योजना आयोग (अब नीति आयोग) के साथ बातचीत के बाद तैयार किया जाता है. बजट पेश करने से पहले वित्त मंत्री और बड़े अधिकारी प्राइवेट सेक्टर, गैर सरकारी संगठनों और दूसरी संस्थाओं के प्रतिनिधियों से मिलते हैं ताकि बजट से उनकी उम्मीदें जानी जा सकें.
सबसे बात करने के बाद सरकार सभी तरह के खर्च और आय का हिसाब लगाकर बजट बनाती है. लोकसभा में बजट पेश करने से पहले वित्त मंत्री को कैबिनेट के सामने बजट प्रस्तावों के बारे में बताना पड़ता है.
आर्थिक सर्वे क्या होता है? बजट में इसकी क्या भूमिका होती है?
आर्थिक सर्वे आने वाले बजट का आधार बनता है. आर्थिक सर्वे मौजूदा आर्थिक स्थिति और ट्रेंड के प्रति सरकार के दृष्टिकोण को पेश करता है. आर्थिक सर्वे बजट पेश करने से कुछ दिन पहले पेश किया जाता है.
स्टैंडिंग कमेटी की भूमिका क्या होती है?
वित्त, रक्षा,गृह, उद्योग जैसी कुल मिलाकर 24 स्टैंडिंग कमेटियां होती है. ये सभी कमेटियां अपनी रिपोर्ट लोकसभा को देती है. इन रिपोर्टों में हर मंत्रालय के प्रस्तावित खर्च का परीक्षण होता है.
स्टैंडिंग कमेटी की रिपोर्ट पेश करने के बाद क्या होता है?
स्टैंडिंग कमेटी की रिपोर्ट पेश करने के बाद संसद में विस्तृत बहस होती है. बहस में सांसद अलग अलग मंत्रालयों को देने दिए जाने वाले खर्च में कटौती की मांग कर सकते हैं. इसके बाद जरूरत पडऩे पर अलग अलग प्रावधानों पर वोटिंग होती है.
बजट प्रक्रिया के आखिरी चरण में क्या होता है?
खर्चों के अलग-अलग मद पर वोटिंग के बाद सरकार की तरफ से एक पेश किया जाता है जिसपर भी वोटिंग होती है. इस बिल के जरिए सरकार को संचित निधि से खर्च करने का अधिकार मिलता है. संचित निधि वो फंड होता है जिसमें सरकार की राजस्व से होनेवाली हर तरह की कमाई, ब्याज से होनेवाली कमाई और कर्ज के जरिए जुटाई गई रकम जमा होती है. इसके बाद सरकार वित्त विधेयक लाती है जिसे लोकसभा में पास किया जाता है. मान लीजिए सरकार को साल में फिर कभी खर्च के लिए अतिरिक्त पैसों की जरूरत पड़ती है जिसके वोटिंग नहीं कराई गई है तो वो सप्लीमेंट्री अनुदान मांग पेश कर सकते हैं. सिर्फ लोकसभा के पास ही बजट को पास करने का अधिकार है. राज्यसभा सिर्फ संशोधन के लिए सुझाव दे सकती है जिसे लोकसभा मान भी सकती है और नहीं भी.
क्या ऐसे कोई खर्च हैं जिनपर संसद में वोटिंग नहीं होती?
ऐसे कुछ खर्च हैं जिनपर संसद में वोटिंग नहीं होती बल्कि वो सीधे संचित निधि से खर्च किए जा सकते हैं. राष्ट्रपति और जजों की सैलेरी और उन्हें दिए जानेवाले भत्ते, कर्ज पर दिया जाने वाला ब्याज जैसे खर्च सीधे संचित निधि से दिए जा सकते हैं

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