छत्तीसगढ़ी साहित्य का विकास

छत्तीसगढ़ व्यक्तित्व

छत्तीसगढ़ी भाषा में जो साहित्य रचा गया, वह करीब एक हज़ार साल से हुआ है। अनेक साहित्यको ने इस एक हजार वर्ष को इस प्रकार विभाजित किया है
(1) गाथा युग – सन् 1000 से 1500 ई. तक
(2) भक्ति युग – मध्य काल – सन् 1500 से 1900 ई. तक
(3) आधुनिक युग – सन् 1900 से आज तक
आदि काल : गाथायुग, (1000 से 1500 ई. तक)
इतिहास की दृष्टि से छत्तीसगढ़ी का गाथायुग को स्वर्ण युग कहा जाता है। गाथायुग के सामाजिक स्थिति तथा राजनीतिक स्थिति दोनों ही आदर्श मानी जा सकती है। छत्तीसगढ़ बौद्ध-धर्म का एक महान केन्द्र माना जाता था। इसीलिये गाथा युग के पहले यहाँ पाली भाषा का प्रचार हुआ था। गाथायुग में अनेक गाथाओं की रचना हुई छत्तीसगढ़ी भाषा में। ये गाथायें प्रेम प्रधान तथा वीरता प्रधान गाथायें है। ये गाथायें मौखिक रुप से चली आ रही है। उनकी लिपिबद्ध परम्परा नहीं थी।
गाथायुग के प्रेम प्रधान गाथाएँ
गाथायुग के प्रेम प्रधान गाथाओं में प्रमुख है
अहिमन रानी की गाथा
केवला रानी की गाथा
रेवा रानी की गाथा
ये सभी गाथाएँ नारी प्रधान है। नारी जीवन के असहायता को दर्शाया है। इन गाथाओं में मंत्र तंत्र और पारलौकिक शक्तियों को भी दर्शाया है।
गाथायुग के धार्मिक एवं पौरानिक गाथाएँ- गाथायुग के धार्मिक एवं पौरानिक गाथाओं में प्रमुख है फुलवासन और पंडवानी फुलवासन है सीता और लक्ष्मण की कथा। इस गाथा में सीता लक्ष्मण से कहती है कि रात को उसने अपने स्वप्न में एक फूल को देखे है। वह फूल का नाम है फुलवासन। सीता लक्ष्मण से अनुरोध करती है कि वे उसे फुलवासन फूल ला दे। लक्षमण जी चल पड़ते है वह फुल लाने और रास्ते की कठिनाइयों का सामना करते हुये पहुँचते है उस जगह जहाँ फुलवासन खिले हुये थे। अन्त में उस फूल को लेकर लक्ष्मण सीता के पास वापस आते है।
पंडवानी है महाभारत के बारे में। लोकजीवन के साथ जुड़ी हुई है यह पंडावनी। इसमें पांडवो की कथा है पर लोकजीवन के साथ इतने सुन्दरता और स्वच्छन्दता के साथ ये जुड़ी हुई है कि हमें ऐसा ऐहसास होता है कि पान्डवों की कथा इसी कोसल में से निकली है। यहां कि रीती रिवाज़ की झलके हमें पंडवानी में दिखती है। जैसे इसमें द्रौपदी मायके जाना चाहती है तीजा के अवसर पर, हरतालिका व्रत के अवसर पर।
भक्ति युग – मध्य काल , (1500 से 1900 ई. तक)
सन् 1536 में सम्भवत रतनपुर के राजा बाहरेन्द्र के काल में मुसलमान राजाओं का आक्रमण हुआ था। इस युद्ध में राजा बाहरेन्द्र की जीत हुई थी। पर इस आक्रमण के कारण एक डर बहुत सालों तक बना रहा। और इसीलिये इस काल में जो गाथा रची गई थी, उसमें वीरता की भाव संचित है। इसके अलावा इस युग में और एक धारा धार्मिक और सामाजिक गीतों की है।
मध्ययुग की वीर गाथाएँ मध्ययुग की धार्मिक एवं सामाजिक गीत धारा
सन्त धरमदास
सतनाम पंथ
स्फुट रचनाएँ
मध्ययुग की वीर गाथाएँ
इस युग में जो गाथाएँ प्रमुख है, वे है फूँलकुवंर की गाथा, कल्यानसाय की गाथा
इसके अलावा है गोपाल्ला गीत रायसिंध के पँवारा देवी गाथा ढोलामारु नगेसर कइना जो लधु गाथाएँ है। इन्हीं गाथाओं के समान है लोरिक चंदनी सरवन गीत बोघरु गीत
फूँलकुँवरकी गाथा में फूल कूँवर को राजा जगत की पुत्री बताया गया है। इसके बारे में अध्येेताओं का ये कहना है कि इतिहास में इस बात का कोई सबूत नहीं मिला। फुलकुँवर रानी झांसी जैसे वीर थी। इस गाथा में ये कहा जाता है कि राजा जगत से मुगलों ने राज्य की मांग की। राजा जगत बड़े चिन्तित हो उठते है। पिता को चिंतित देख पुत्री फूलकुँवर जब बार-बार पूछती है कि क्यों वे चिन्तित है, राजा जगत उसे सब कुछ बताते है। ये सुनकर फूलकुँवर युद्ध करने के लिए तैयारी करती है और युद्ध में मुगलों को परास्त करती है। इस गाथा में फूँलकुवर का मुगलों से किये गये युद्ध का वर्णन है। फूँलकुवर वीरांगना के रुप मे पेश हुई है।
कल्यानसाय की गाथा में कल्यानसाय की वीरता को दर्शाया गया है। कल्यानसाय थे रतनपुर के सम्राट बाहारेन्द्र के पुत्र। यह गाथा इतिहास से जुड़ी हुई है। राजा कल्यानसाय मुगल सम्राट जहाँगीर के समकालीन थे। सन् 1544 की बात है। उस वक्त रतनपुर स्वतंत्र था। कल्यानसाय का राज्यकाल लगभग सन् 1544 से सन् 1581 तक कहा जाता है। जाहांगीर ने उन्हें दिल्ली में आमन्त्रित की कल्यानसाय को आठ वर्षो तक दिल्ली में रहना पड़ा था। कल्यानसाय की माता भवानामति ने उन्हे दिल्ली नहीं जाने के लिए कही थी। उन्हें डर था कि वे धर्म परिवर्तन करेंगे।
मध्ययुग की धार्मिक एवं सामाजिक गीत धारा
मध्ययुग की धार्मिक एवं सामाजिक गीत धारा का आरम्भ कबीर से जुड़ी हुई है। हम इस युग में देखते है कि जो आंचलिक सम्प्रदायों कबीर से प्रभावित थीं, एवं जो पंथो कबीर प्रभावित थे, उन्ही के कारण इस युग की धार्मिक एवं सामाजिक गीत धारी बनी। छत्तीसगढ़ी साहित्य का प्रथम लिपिबद्धता कबीरपन्थ के योगदान के कारण ही हुआ है।
सन्त धरमदास
कबीर दास के अनेक शिष्यों में सन्त धरमदास ही है जिनके छत्तीसगढ़ी गीत आज भी लोग गाते रहते है।
ऐसा माना जाता है की सन्त धरमदास छत्तीसगढ़ के वे प्रथम कवि हैं जिन्होने लोकगीतों की सहज-सरल शैली में निगूढ़तम दार्शनिक भावनाओं की अभिव्यक्ति की ओर छत्तीसगढ़ भाषा की शक्तियों को आत्मसात करते हुए उच्चतर मानवीय भावों के संवहन के योग्य बनाया।
संत धासीदास ने सतनाम पंथ की स्थापना की थी। वे छत्तीसगढ़ के थे। छत्तीसगढ़ के गिरोद नाम का गांव में संत धासीदास पैदा हुए थे। किसानी एवं मजदूरी करके वे जीवनयापन करते थे। सतनाम पंथ की जो रचनाएँ है उसमें भी ईश्वर कृपा पाने के बात कही गई है, तथा इस संसार की स्वार्थ परता को चित्रन किया गया है।
छत्तीसगढ़ के मध्ययुग का तीसरा स्वर है स्फुट रचनाओं का। इस युग में अनेक कवियों में कुछ नाम बड़े ही उल्लेखनीय है।
गोपाल कवि – माखन कवि – रेवा राम – प्रह्मलाद दूबे
गोपाल कवि और उनका पुत्र माखन कवि, दोनों रतनपुर के निवासी थे। रतनपुर राज्य में उस वक्त कलचुरि राजा राजसिंह राज्य कर रहे थे। गोपाल कवि के कई रचनायें है। उनमें से कुछ रचनाओं का उल्लेख किया जाता है जैसे –
जैमिनी अश्वमेघ – सुदामा चरित
भक्ति चिन्तामणि – छन्द विलास
गोपाल कवि ने छत्तीसगढ़ी में पद्य नहीं रची फिर भी उनकी काव्य रचनाओं में छत्तीसगढ़ी का प्रभाव है। बाबु रेवाराम ने कई सारे काव्य ग्रन्थों की रचना की है। लक्ष्मण कवि का नाम का उल्लेख उनकी भोंसला वंश प्रशस्ति के संदर्भ में किया जाता है। इस काव्य में अंग्रेजो के अत्याचार के बारे में विस्तृत विवरण पाई जाती है। प्रह्मलाद दूवे जी, सारगंढ़ के निवासी थे। उनकी काव्य जय चन्द्रिका छत्तीसगढ़ के प्राकृतिक सौन्दर्यता का दर्शाया है।
आधुनिक युग (1900 ई. से अब तक)
छत्तीसगढ़ भाषा साहित्य का आधुनिक युग 1900 ई. से शुरु होता है। इस युग में साहित्य की अलग-अलग विधाओं का विकास बहुत ही अच्छी तरह से हुआ है। डॉ. सत्यभामा आडि़ल अपनी पुस्तक छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य में लिखती हैं –
पं. सुन्दरलाल शर्मा
पं. सुन्दरलाल शर्मा जो स्वाधीनता संग्रामी थे, वे उच्च कोटी के कवि भी थे। शर्माजी ठेठ छत्तीसगड़ी में काव्य सृजन की थी। पं. सुन्दरलाल शर्मा को महाकवि कहा जाता है। किशोरावस्था से ही सुन्दरलाल शर्मा जी लिखा करते थे। उन्हें छत्तीसगड़ी और हिन्दी के अलावा संस्कृत, मराठी, बगंला, उडिय़ा एवं अंग्रेजी आती ती। हिन्दी और छत्तीसगड़ी में पं. सुन्दरलाल शर्मा ने 21 ग्रन्थों की रचना की। उनकी लिखी छत्तीसगड़ी दानलीला आज क्लासिक के रुप में स्वीकृत है।
पं. सुन्दरलाल शर्मा की प्रकाशित कृतियाँ – 1. छत्तीसगढ़ी दानलीला 2. काव्यामृतवर्षिणी 3. राजीव प्रेम-पियूष 4. सीता परिणय 5. पार्वती परिणय 6. प्रल्हाद चरित्र 7. ध्रुव आख्यान 8. करुणा पच्चीसी 9. श्रीकृष्ण जन्म आख्यान 10. सच्चा सरदार 11. विक्रम शशिकला 12. विक्टोरिया वियोग 13. श्री रघुनाथ गुण कीर्तन 14. प्रताप पदावली 15. सतनामी भजनमाला 16. कंस वध। उनकी छत्तीसगढ़ी रामलीला प्रकाशित नहीं हुई। एक छत्तीसगड़ी मासिक पत्रिका दुलरुबा के वे संपादक एवं संचालक थे।
पं. बंशीधर पांडे
पं. बंशीधरपाण्डे जी का जन्म सन् 1892 ई. में हुआ था। छत्तीसगढ़ी भाषा के पहले उपन्यासकरा के रुप में जाने जाते हैं। उस उपन्यास का नाम है हीरु की कहिनी जो छत्तीसगढ़ी भाषा में पहला उपन्यास था। सुशील यदु, अपनी पुस्तक लोकरंग भाग-2 , छत्तीसगड़ी के साहित्यकार में लिखते हैं – जइसे साहित्य में पं. चन्द्रधर शर्मा गुलेरी हा तीन कहानी लिखकर हिन्दी साहित्य में प्रतिष्ठित होगे बइसने बंशीधर पाण्डे पांडजी 1926 में एक छत्तीसगढ़ी लघु उपन्यास हीरु के कहानी लिखकर छत्तीसगड़ी साहित्य में अमर होगे। आज उन्हला पहिली छत्तीसगड़ी उपन्यासकार होय के गौरव मिले है। बंशीधर पांडे जी साहित्यकार पं. मुकुटधर पाण्डेजी के बड़े भाई और पं. लोचन प्रसाद पाण्डेजी के छोटे भाई थे। उनका लिखा हुआ हिन्दी नाटक का नाम है विश्वास का फल एवं उडिय़ा में लिखी गई गद्य काव्य का नाम है गजेन्द्र मोक्ष
कवि गिरिवरदास वैष्णव
कवि गिरिवरदास वैष्णव जी का जन्म 1897 में रायपुर जिला के बलौदाबाजार तहसील के गांव मांचाभाठ में हुआ था। उनके पिता हिन्दी के कवि रहे हैं, और बड़े भाई प्रेमदास वैष्णव भी नियमित रुप से लिखते थे। उनकी प्रसिद्ध छत्तीसगढ़ी कविता संग्रह छत्तीसगढ़ी सुनाज के नाम से प्रकाशित हुई थी। उनकी कविताओं में समाज के झलकियाँ मिलती है। समाज के अंधविश्वास, जातिगत ऊँत-नीच, छुआछूत, सामंत प्रथा।
स्व. प्यारेलाल गुप्त
साहित्यकार एवं इतिहासविद् श्री प्यारेलाल गुप्तजी का जन्म सन् 1948 में रतरपुर में हुआ था। गुप्तजी आधुनिक साहित्यकारों के भीष्म पितामाह कहे जाते हैं। उनके जैसे इतिहासविद् बहुत कम हुए हैं। उनकी प्राजीन छत्तीसगढ़ इसकी साक्षी है। साहित्यिक कृतियाँ – 1. प्राचीन छत्तीसगढ़ 2. बिलासपुर वैभव 3. एक दिन 4. रतीराम का भाग्य सुधार 5. पुष्पहार 6. लवंगलता 7. फ्रान्स राज्यक्रान्ति के इतिहास 8. ग्रीस का इतिहास 9. पं. लोचन प्रसाद पाण्डे । गुप्त जी अंग्रेजी, हिन्दी, मराठी तीनों भाषाओं में बड़े माहिर थे। गांव से उनका बेहद प्रेम था। प्राचीन छत्तीसगढ़ लिखते समय गुप्तजी निरन्तर सात वर्ष तक परिश्रम की थी। इस ग्रन्थ में छत्तीसगढ़ के इतिहास, संस्कृति एवं साहित्य को प्रस्तुत किया गया है।
कोदूराम दलित
कोदूराम दलित का जन्म सन् 1910 में जिला दुर्ग के टिकरी गांव में हुआ था। गांधीवादी कोदूराम प्राइमरी स्कूल के मास्टर थे उनकी रचनायें करीब 800 (आठ सौ) है पर ज्यादातर अप्रकाशित हैं। कवि सम्मेलन में कोदूराम जी अपनी हास्य व्यंग्य रचनाएँ सुनाकर सबको बेहद हँसाते थे। उनकी रचनाओं में छत्तीसगढ़ी लोकोक्तियों का प्रयोग बड़े स्वाभाविक और सुन्दर तरीके से हुआ करता था। उनकी रचनायें – 1. सियानी गोठ 2. कनवा समधी 3. अलहन 4. दू मितान 5. हमर देस 6. कृष्ण जन्म 7. बाल निबंध 8. कथा कहानी 9. छत्तीसगढ़ी शब्द भंडार अउ लोकोक्ति।
हरि ठाकुर
हरि ठाकुर का जन्म 1926 में रायपुर में हुआ था। उनकी मृत्यु सन् 2001 में हुई। वे रायपुरवासी थे। न सिर्फ साहित्यकार, गीतगार थे हरि ठाकुर बल्कि छत्तीसगढ़ राज्य के आन्दोलन में डॉ. खूबचन्द बघेल के साथ थे। स्वाधिनता संग्रामी ठाकुर प्यारेलाल सिंह के पुत्र होने के नाते हरिसिंह की परवरिस राजनीतिक संस्कार में हुई थी। छात्रावास में वे छात्रसंघ के अध्यक्ष रह चुके थे। उन्होंने बी.ए.एल.एल.बी. की थी। वे हिन्दी एवं छत्तीसगढ़ी, दोनों भाषाओं में लिखते थे। उनके हिन्दी काव्य – 1 ) नये स्वर, 2 ) लोहे का नगर, 3 ) अंधेरे के खिलाफ, 4 ) मुक्ति गीत, 5 ) पौरुष :नए संदर्भ, 6 ) नए विश्वास के बादल छत्तीसगढ़ी काव्य – 1 ) छत्तीसगड़ी गीत अउ कविता, 2 ) जय छत्तीसगढ़, 3 ) सुरता के चंदन, 4 ) शहीद वीर नारायन सिंह, 5 ) धान क कटोरा, 6 ) बानी हे अनमोल, 7 ) छत्तीसगढ़ी के इतिहास पुरुष, 8 ) छत्तीसगढ़ गाथा।
बद्रीविशाल परमानंद
परमानन्द जी छत्तीसगढ़ के माटी के कवि हैं। छत्तीसगढ़ के माटी ले ओखर भाषा बनथे, ओखर शब्द अउ बिम्ब लोकरंग अउ लोकरस से सनाये हे। ओखर रचना हा गांव लकठा में बोहावत शांत नदिया के समान हे जउन अपने में मस्त हे। उनका जन्म गांव छतौना में 1917 में हुआ था।
कपिलनाथ कश्यप
कपिलनाथ कश्यप का जन्म 1906 में बिलासपुर जिले के ग्रामीण अंचल में हुआ था, 1985 में उनकी मृत्यु हुई है। कपिलनाथजी रामचरितमानस का छत्तीसगढ़ी भाषा में अनुवाद किया। उनकी छत्तीसगढ़ी और हिन्दी भाषा में कई रचनाएं हैं
1 ) रामकथा, 2 ) अब तो जागौ रे, 3 ) डहर के कांटा, 4 ) श्री कृष्ण कथा, 5 ) सीता के अग्नि परीक्षा, 6 ) डहर के फूल, 7 ) अंधियारी रात, 8 ) गजरा, 9 ) नवा बिहाव, 10 ) न्याय, 11 ) वैदेही-विछोह।
हेमनाथ यदु
हेमनाथ यदुजी का जन्म 1924 में रायपुर में हुआ था। छत्तीसगढ़ी बोलचाल की भाषा में वे रचनायें लिखकर गये। उनकी रचनायें तीन भागों में है – 1 ) छत्तीसगढ़ के पुरातन इतिहास से सम्बंधित, 23 ) लोक संस्कृति से संबंधित साहित्य, 3 ) भक्ति रस के साहित्य – छत्तीसगढ़ दरसन
भगवती सेन
भगवती सेन का जन्म 1930 में धमतरी के देमार गांव में हुआ था । उनकी कवितायें किसान, मजदूर और उपेक्षित लोगों के बारे में है। प्रगतिशील कवि थे। छत्तीसगढ़ी कविताओं का संकलन दो पुस्तकों में की गई है। पहला है – नदिया मरै पियास और दुसरा है – देख रे आंखी , सुन रे कान १981 में भगवती सेन का देहान्त हो गया है। उनकी कवितायें न जाने कितने लोगों को सच्चाई जानने के लिए प्रेरित करती है। उनकी कवितायें, उनके गीत एक सच्चे इन्सान की देन है।
डॉ. पालेश्वर शर्मा
डॉ. पालेश्वर शर्मा का जन्म 1928 में जांजगीर में हुआ था। वे महाविद्यालय में अध्यापक थे। छत्तीसगढ़ी गद्य और पद्य दोनों में उनका समान अधिकार है। उन्होंने ‘छत्तीसगढ़ के कृषक जीवन की शब्दावली पर पी.एच.डी. की।प्रकाशित कृतियाँ – 1 ) प्रबंध पाटल 2 ) सुसक मन कुररी सुरताले 3 ) तिरिया जनम झनि देय (छत्तीसगढ़ी कहानियाँ) 4 ) छत्तीसगढ़ का इतिहास एवं परंपरा 5 ) नमस्तेऽस्तु महामाये 6 ) छत्तीसगढ़ के तीज त्योहार 7 ) सुरुज साखी है (छत्तीसगढ़ी कथाएँ) 8 ) छत्तीसगढ़ परिदर्शन 9 ) सासों की दस्तक – इसके अलावा पचास निबंध और 100 कहानियाँ। डॉ. पालेश्वर शर्मा ने छत्तीसगढ़ी शब्द कोश् की रचना की है।
केयूर भूषण
केयूर भूषण का जन्म 1928 में दुर्ग जिले में हुआ था। उन्होंने 11 साल की उम्र से ही आज़ादी की लड़ाई में भाग लेना शुरु कर दिया। सिर्फ 18 साल के थे जब 1942 के आन्दोलन में भाग लेकर नौ महीने के लिये जेल में रहे थे। बाद में किसान मजदूर आन्दोलन में जुड़कर जेल गये थे।
केयूर भूषण जी गांधीवादी चिंतक रहे है। हरिजन सेवक संघ के पदाधिकारी रह चुके हैं। रायपुर लोकसभा से दो बार सासंद चुने गए। आजकल वे लखन कार्य में व्यस्त रहते हैं, समाज की उन्नति के लिए लगातार काम कर रहे हैं। उनकी रचनायें हैं – लहर (कविता संकलन) कुल के मरजाद (छत्तीसगढ़ी उपन्यास) कहाँ बिलोगे मोर धान के कटोरा (छत्तीसगढ़ी उपन्यास) कालू भगत (छत्तीसढ़ी कथा संकलन) छत्तीसगढ़ के स्वतंत्रता सेनानियाँ।
केयूर भूषण जी छत्तीसगढ़ी अउ छत्तीसगढ़ संदेश साप्ताहिक सम्पादन करते हैं।


छत्तीसगढ़ के प्रमुख साहित्यकार व कृतियां
साहित्यकार प्रमुख कृति
माधव राव सप्रे : गीता रहस्य, रामचरित, एकनाथ चरित्र
बलदेव प्रसाद मिश्र : तुलसी दर्शन,साकेत संत,श्रंृगार शतक
पं. केदार नाथ ठाकुर : बस्तर भूषण
पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी : झलमला, प्रदिप, अश्रुदल, शतरंज
हरि ठाकुर : नये स्वर, सुरता के चंदन, अंधेरे के खिलाफ,
अब्दुल लतीफ घोंघी : तिकोने चेहरे, उड़ते उल्लू के पंख, तीसरे बंदर की कथा, संकटकाल
डॉ. धनंजय वर्मा : अंधेर नगरी, अस्वाद के धरातल निराला काव्य और व्यक्त्वि
त्रिभुवन पांडे : भगवान विष्णु की भारत यात्रा, झुठ जैसा सच
श्याम लाल चतुर्वेदी : राम वनवास(छत्तीसगढ़ कृति), पर्राभर लाई(काव्य संकलन)
श्री विनोद कुमार शुक्ल : नौकर की कमीज, लगभग जय हिन्द, वह आदमी चला गया
डॉ.पालेश्वर शर्मा : सुसक झन, कुररी सुरता ले, तिरिया जन्म झनि दे,छत्तीसगढ़ परिदर्शन, नमोस्तु महामाये, सांसो की दस्तक
गोपाल मिश्र : खुब तमाशा, जैमिनि अश्वमेघ, सुदामा चरित भक्ति चिंतामणि,राम प्रताप
माखन लाल मिश्र : छंद विलास नामक पिंगल गं्रथ
रेवाराम बाबू : रामायण दीपिका, ब्राम्हण स्त्रोत, गंगा लहरी रामाश्वमेघ, विक्रम विलास, रत्न परिक्षा, दोहाबली माता के भजन, रत्नपुर का इतिहास
प्रहलाद दुबे : जय चंद्रिका
लक्ष्मण कवि : भोंसला वश प्रशस्ति
दयाशंकर शुक्ल : छत्तीसगढ़ लोक साहित्य का अध्ययन
पं.शिवदत्त शास्त्री : इतिहास समुच्चय
लोचन प्रसाद पांडेय : मृगी दु:ख मोचन, कौशल प्रशास्ति दो मित्र
पं. सुन्दरलाल शर्मा : छत्तीसगढी़ दानलीला, प्रहलाद चरित्र, करूणा पच्चीसी
कोदूलाल दलित : सियानी गोठ, हमारा देश, प्रकृतिवर्धन
कनवा, दू मितान
पंडित रामदयाल तिवारी : गाँधीम्प एक्सरेड,
श्रीकांत वर्मा : भटका मेघ, मायादर्पण, दूसरे के पैर, दूसरी बार, अश्वत्थ, व्यूक,
कृष्णकुमार शर्मा : छेरछेरा,
पं. जय नारायण पाण्डेय : चिन्तन धारा,
पं. जगन्नाथ प्रसाद : छन्द प्रभाकर, काव्य प्रभाकर, खुसरा चिरई के बिहाव(छत्तीसगढ़ी)
मुकुटधर पाण्डेय : पूजा के फूल, ह्नदय दान, कुररी के प्रति,
घनश्याम सिंह गुप्त : अफजल खॉ की तलवार, शिवाजी का बघनखा
गजानन माधव मुक्ति बोध : चाँद का मुंह टेढ़ा है, काठ का सपना
पं. बंशीधर पाण्डेय : हीरू के कहिनी
शिव शंकर शुक्ल : दीयना के अंजोर,
लखन लाल गुप्त : चंदा अमरित बरसाइस,
केयूर भूषण : कुल के मरजाद साहित्यक तथ्य
1463 में पैदा हुए संत कबीरदास के शिष्य धनी धर्मदास को छत्तीसगढ़ी का पहला कवि माना जाता है।
उसके बाद 17 वीं शताब्दी में रतनपुर के राज कवि गोपाल मिश्र के महाकाव्य का प्रमाण मिलता है।
1926 में छत्तीसगढ़ी में पहली उपन्यास ‘हीरू के कहिनी’ बंशीधर शर्मा ने लिखा।
लोचन प्रसाद पांडेण्य की ‘ कालिकाल’ नामक कृति को छत्तीसगढ़ी का पहला नाटक माना जाता है।
1885 में ठाकुर जगमोहन सिंह ने इस अंचल में खड़ी बोली के उपन्यास ‘श्यामा स्वप्न’ की रचना की ।
1901 मेें हिन्दीं की पहली कहानी ‘टोकरी भर मिट्टी’ छत्तीसगढ़ मित्र में प्रकाशित हुई जिसके रचनाकार माधव राव सप्रे हैं।
छायावाद शब्द का सर्वप्रथम उपयोग मुकुटधर पांडेय ने किया।
विनोद कुमार शुक्ल, साहित्य अकादमी पुरस्कार पाने वाले छ.ग. के एकमात्र रचनाकार है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *