छत्तीसगढ़ में कबीरपंथ

छत्तीसगढ़ संस्कृति

सर्वविदित है कबीर के शिष्यों की संख्या काफी थी। चार शिष्यों जागू साहेब, भगवान साहेब, श्रुतिगोपाल साहेब और धनी धर्मदास साहेब महत्वपूर्ण माने जाते हैं। इनके साथ ही दो और शिष्यों तत्वा और जीवा का नाम भी बड़े आदर के साथ लिया जाता है। संभवत: इन्ही शिष्यों ने मिलकर कबीर के नाम पर कबीर पंथ की स्थापना की होगी।
कबीर पंथ की विविध शाखाएं
कबीर चौरा काशी- कबीर पंथ की शाखाओं में यह पहली शाखा मानी जाती है जिसकी स्थापना सूरत गोपाल (श्री श्रुतिगोपाल) ने की थी। इसकी शाखाएं पूरे भारत में मुख्य रूप से लहरतारा, मगहर, बलुआ, गया, बड़ौदा, नडिय़ाद, अहमदाबाद है।
कबीरपंथ की भगताही (धनौती) शाखा-बिहार के छपरा जिले में स्थित धनौती ग्राम में भगताही शाखा का प्रधान मठ है। इस शाखा के प्रथम आचार्य श्री भगवान साहेब थे। इसकी शाखाएं बिहार के साथ-साथ पूरे भारत में यहां-वहां फैली है जिनमें प्रमुख नौरंगा, मानसर, दामोदरपुर, चनाव (छपरा) शेखावना (बेतिया) तधवा, बड़हरवा, सवैया, बैजनाथ (मोतिहारी, लहेजी और तुर्की है।
कबीरपंथ की छत्तीसगढ़ी शाखा- इस शाखा के प्रवर्तक धनी धर्मदास जी थे। जिनका जन्म मध्यप्रदेश के रींवा जिले में बांधवगढ़ में हुआ था। पूर्व में मूर्तिपूजक वैष्णव मत के अनुयायी थे। प्रौढ़ावस्था में तीर्थयात्रा पर गए और वहीं मथुरा में इनकी मुलाकात कबीर से हुई। प्रभावित होकर धर्मदास ने मूर्तिपूजा आदि छोड़ दी व उन्हें अपने घर बांधवगढ़ आमंत्रित किया, पत्नी व बच्चों सहित दीक्षा ले ली। धर्मदास साहेब पूर्व नाम जुड़ावन प्रसाद था, बांधवगढ़ में संत समागम आयोजित किया था और वहां कबीर भी उनके आमंत्रण पर पधारे थे। इसी दौरान धर्मदास ने कबीर के कहे अनुसार अपने पूर्व गुरु रूपदास जी से इजाजत लेकर पत्नी सुलक्षणा देवी और बच्चों नारायणदास व चूरामणि समेत दीक्षा ली। दीक्षा के बाद सुलक्षणा देवी आमिन माता व चूरामनि, मुक्तामणि के नाम से जाने गए। कबीर नें धर्मदास को सारी संपत्ति दान करने के बाद ही धनी कहकर संबोधित किया तब से उन्हें धनी धर्मदास ही कहा जाने लगा।
कुदुरमाल से कवर्धा और फिर दामाखेड़ा का सफर- कुदुरमाल के बाद गद्दियां रतनपुर, मंडला, धमधा, सिगोढ़ी, कवर्धा आदि में स्थापित हुई। अंतत: बारहवें महंत उग्रमुनि नाम साहेब ने विक्रम संवत् 1953 में रायपुर जिले के दामाखेड़ा में मठ स्थापित किया।
दामाखेड़ा में कबीरपंथ वंशगद्दी की स्थापना के लिए ग्राम दामाखेड़ा को तब 14000 रूपए में बेमेतरा के कुर्मी भक्तों ने खरीदा था। यहां हर साल माघ शुक्ल दशमी से पूर्णिमा तक विशाल संत समागम व मेला का आयोजन होता है
छत्तीसगढ़ में आचार्य गद्दी पर विराजमान
1. मुक्तामणि नाम साहेब विसं1538 से 1630, 2. सुदर्शन नाम साहेब विसं 1595 से 1630, 3. कुलपत नाम साहेब विक्रम संवत 1652 से 1690, 4. प्रमोद गुरु बालापीर साहेब विक्रम संवत 1728 से 1750, 5. केवल नाम साहेब विक्रम संवत 1760 से 1775, 6. अमोल नाम साहेब विक्रम संवत 1782 से 1825, 7. सुरत सनेही नाम साहेब विक्रम संवत 1802 से 1853, 8. हक्क नाम साहेब विक्रम संवत 1835 से 1890, 9. पाक नाम साहेब विक्रम संवत 1855 से 1912, 10. प्रकट नाम साहेब विक्रम संवत 1875 से 1939, 11. धीरज नाम साहेब विक्रम संवत 1899 से 1937, (धीरज नाम साहेब गद्दीनशीन नही हुए क्योंकि इनका सतलोक गमन प्रकटनाम साहेब से पहले ही हो गया था), 12. उग्रनाम साहेब विक्रम संवत 1929 से संवत 1971, 13. दया नाम साहेब विक्रम संवत 1956 से 1984, 14. गृन्धमुनि नाम साहेब विक्रम संवत 1922( सन 1935) से सन 1992 तक, 15. प्रकाश मुनि नाम साहेब जिनका जन्म हुआ सन 1967 में, 1990 में गद्दीनशीन हुए व वर्तमान में यही दामाखेड़ा के पंद्रहवें वंशगद्दी आचार्य हैं।

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