छत्तीसगढ़ में आज भी जीवित है सिंधु घाटी सभ्यता की मूर्ति बनाने की कला

छत्तीसगढ़ विशेष संस्कृति समसामयिक

ढोकरा कला के माध्यम से पुश्तैनी हुनर को बढ़ा रहे आगे पूरण
रायपुर / छत्तीसगढ़ में हजारों साल पहले की मूर्ति बनाने की कला आज भी जीवित है। यहाँ के शिल्पकार धातुओं में बारीक दस्तकारी कर अनोखी कलाकृतियाँ तैयार करते हैं। ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार सिंधु घाटी सभ्यता के दौरान मूर्ति बनाने की ये कला प्रचलित थी। छत्तीसगढ़ में मूर्ति बनाने की इस विधि को घड़वा और ढोकरा शिल्प के नाम से जाना जाता है।
प्रदेश की जनजातियों के द्वारा तैयार की गयी कलाकृतियां देश के साथ ही विदेशों में भी प्रसिद्ध है, और यहाँ के कलाकारों को इसके लिए कई राष्ट्रीय और अंतर राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल चुके हैं। ऐसे ही एक युवा कलाकार हैं पूरण झोरका जो की रायगढ़ जिले के शिल्पग्राम एकताल के निवासी हैं। पूरण अपनी ढोकरा शिल्प के पुश्तैनी हुनर को आगे बढ़ा रहे हैं। प्रसिद्ध गायक कैलाश खेर ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट के माध्यम से पूरण की तारीफ की है। पूरण बताते हैं कि ढोकरा शिल्प मनमोहक कलाकृतियाँ बनाने में बहुत मेहनत लगती है। एक मूर्ति बनाने की प्रक्रिया काफी लंबी होती है। मिट्टी का ढांचा तैयार कर उस पर मोम का लेप लगाया जाता है। जिसके बाद मोम पर बारीक कलाकृतियाँ उकेरी जाती है। इसे भट्टी में तपाया जाता है और धातु पिघला कर डाली जाती है। मोम के पिघलने के बाद धातु उसका स्थान ले लेता है, जिसे काफी देर ठंडा होने दिया जाता है और इस तरह कोई कलाकृति तैयार होती है।
छत्तीसगढ़ में बस्तर और रायगढ़ जिले के जनजाति इस शिल्प कला में पारंगत हैं। ढोकरा शिल्प कला में अधिकतर जनजाति संस्कृति पर आधारित कलाकृतियाँ बनाते हैं, जो देवी देवताओं की मूर्तियों के अलावा लोक जीवन से जुड़ी वस्तुओं पर केन्द्रित होते हैं।

बस्तर की एक अनोखी कला है ढोकरा
यह दस्तकारों की एक प्राचीन कला है. प्रमुख रूप से यह कार्य घसिया जाति के लोग करते हैं. इस कला में तांबा, जस्ता व रांगा आदि धातुओं के मिश्रण की ढलाई करके मूर्तियां, ज्वैलरी, बर्तन, व रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाला सामान बनाया जाता है. मिट्टी, मोम और धातु के प्रयोग से तैयार यह कला सहज ही मन को आकर्षित कर लेती है. इस विधि में क्योंकि मधुमक्खी के मोम का इस्तेमाल होता है. इसलिए इस कला को मोम क्षय विधि भी कहते हैं. अंग्रेजी में इसे वेक्स लॉस प्रोसेस कहते है.
भा रत एक ऐसा देश है, जहां अनेक कलाओं व संस्कृतियों का मिश्रण देखने को मिलता है. और सभी तरह की कलाएं किसी न किसी रूप में इतिहास से जुडक़र अपनी गौरवशाली गाथा कहती है. इन्हीं में से एक है छत्तीसगढ़ के दक्षिण में बसे बस्तर की ढोकरा कला. जिसका दूसरा नाम घढ़वा कला भी है. यह बस्तर की विश्व प्रसिद्ध शिल्पकला है. यह जितनी प्राचीन है उतनी ही असाधारण भी. इसकी गहराई में उतरने पर किसी न किसी रूप में इतिहास सामने आने लगता है. इसका संबंध मोहन जोदड़ो से प्राप्त कांसे की मूर्ति से भी है.
क्या है ढोकरा कला
यह दस्तकारों की एक प्राचीन कला है. प्रमुख रूप से यह कार्य घसिया जाति के लोग करते हैं. इस कला में तांबा, जस्ता व रांगा आदि धातुओं के मिश्रण की ढलाई करके मूर्तियां, ज्वैलरी, बर्तन, व रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाला सामान बनाया जाता है. मिट्टी, मोम और धातु के प्रयोग से तैयार यह कला सहज ही मन को आकर्षित कर लेती है. इस विधि में क्योंकि मधुमक्खी के मोम का इस्तेमाल होता है. इसलिए इस कला को मोम क्षय विधि भी कहते हैं. अंग्रेजी में इसे वेक्स लॉस प्रोसेस कहते है.
कैसे बनती हैं कलाकृतियां
इसमें कलाकृति धातु की बनती है, लेकिन, कलाकार उसे मोम में साधता है. जो भी मूर्ति बनाते है उसका पहले क्ले से ढांचा तैयार किया जाता है. उसके बाद क्ले के इस ढांचे को मधुमक्खी के मोम से कवर करके उस पर डिजाइन तथा आकृतियां उकेरी जाती हैं. और उसे दोबारा क्ले से कवर कर दिया जाता है. क्ले की यह दूसरी पर्त मोम पर उकेरे गए डिजाइनों को कॉपी कर लेती है. इसके बाद इस क्ले को पाकाया जाता है. क्ले के पकते समय मोम पिघल जाता है. मोम की खाली हुई जगह को बाद में तरल धातु से भर दिया जाता है. यह तरल धातु भीतरी भागों में जाकर वही आकृति ले लेती है जो मोम की थी. जब धातु ठोस हो जाती है तो बाद में क्ले की पर्तें हटा दी जाती हैं. धातु की तैयार मूर्ति को फाइनल फिनिशिंग देकर आकर्षण बना दिया जाता है.

प्राचीन है तकनीक

यहां की सांस्कृतिक विरासत और पुरातात्विक अवशेषों से मिलने वाले सामान के अध्ययन से यह पता चलात है कि ईसा पूर्व से ही यहां वास्तुकला, मूर्तिकला, और धातुकला का विकास हो चुका था. इस इलाके की शिल्प कला को देखकर ऐसा महसूस होता है कि ये शिल्प कला छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक वैभव की मौन भाषा है . आदिवासी संस्कृति के इन शिल्पों में दो प्रकार के शिल्पों का निर्माण होता है. पहला देवी-देवताओं के शिल्प जिनमें प्रमुखत: घोड़ों पर सवार देवियां है, या जो हाथों में खड्ग, ढाल, अन्न की बालियां व मयूर पंख धारण किए हुए हैं जैसे तेलगिन माता मूर्ति, कंकालिन माता आदि. और, दूसरा पशु आकृतियां जिनमें हाथी, घोड़े की आकृति प्रमुख है. इनके अलावा शेर मछली कछुआ मोर इत्यादि बनाए जाते है. आधुनिक समय में घर की सजावट के लिए विभिन्न सामानों का निर्माण इन शिल्पियों की अपनी खुद की रचनात्मक पहल है.

आज भी जीवंत है कला

यूं तो छत्तीसगढ़ अलग-अलग इलाकों में धातुशिल्प के निर्माण की परम्परा लंबे समय से रही है. प्रदेश के आदिवासी कलाकार पारम्परिक रूप से धातु की ढलाई कर आकर्षक कलाकृतियों बनाते रहे हैं. इस परम्परागत कला में, इतिहास और संस्कृति के अनेक उतार-चढ़ाव कांस्य युग से वर्तमान युग तक की लम्बी परम्परा में सुरक्षित है. साढ़े चार पांच हजार वर्षों की यह समृद्ध कला परम्परा थोड़े परिवर्तन के साथ आज भी सुरक्षित है. आदिवासी समाज ने इस कला परम्परा को धरोहर के रूप में न सिर्फ सुरक्षित रखा बल्कि इसे जीवन्त भी बनाये रखा.

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