जशपुर की पहचान: चाय के बागान : कांटाबेल में 40 एकड़ रकबे में विकसित हो रहा चाय बागान

छत्तीसगढ़ समसामयिक

रायपुर. छत्तीसगढ़ राज्य के सीमावर्ती जिले जशपुर की जलवायु चाय की खेती के लिए अनुकूल है। यह बात अब प्रमाणित हो चुकी है। सारूडीह में 20 एकड़ में विकसित चाय बागान की सफलता ने जिला प्रशासन को इस मुहिम को आगे बढ़ाने का हौसला दिया है। वैसे तो जशपुर जिले की पहचान वहां की कला, संस्कृति एवं प्रचुर मात्रा में वन संपदा एवं प्राकृतिक सौंदर्य से आच्छादित पहाड़ियां और सुरम्य वादियों को लेकर है। सारूडीह में बीते पांच सालों से चाय की सफल खेती में जशपुर को एक नई पहचान दी है। यहां पर्वत और जंगल के बीच 20 एकड़ रकबे में अनुपयोगी भूमि पर चाय बागान लग जाने आसपास न सिर्फ हरियाली है, बल्कि पर्यटन और पर्यावरण के लिहाज से भी यह स्थान बेहद मनोरम हो गया है।
सारूडीह में उत्पादित चाय की क्वालिटी दार्जलिंग में पैदा होने वाली चाय से बेहतर है। इसे विशेषज्ञों ने माना और सराहा है। जिला प्रशासन द्वारा इसी तर्ज पर मनोरा ब्लॉक के ग्राम कांटाबेल में पहाड़ी की तलहटी में 150 एकड़ रकबे में चाय और काफी की खेती की कार्ययोजना बनाकर इसको अमली रूप देने की शुरूआत कर दी है। प्रथम चरण में कांटाबेल में चाय बागान विकसित करने के लिए 40 एकड़ रकबे में चाय के पौधों का रोपण किया जा चुका है। सिंचाई के लिए यहां ड्रिप एरीगेशन सिस्टम लगाए जाने के साथ ही समीप में बहने वाले नाले को बांधकर पानी की व्यवस्था की गई है। कांटाबेल में चाय का बागान लगाये जाने से ग्रामीणों को गांव में ही रोजगार मिलने लगा है। कांटाबेल चाय बगान गांव के ही 21 किसानों की ऊबड़-खाबड़ अनुपजाऊ भूमि पर विकसित किए जा रहे है। वन विभाग द्वारा कंवर्जेन्स के माध्यम से विकसित किए जा रहे इस चाय बागान के देखरेख की जिम्मेदारी गांव के ही रौशन महिला स्व-सहायता समूह एवं गोपाल स्व-सहायता समूह ने अपने जिम्मे ले रखी है। कांटाबेल में ही चाय एवं काफी बागान के साथ ही प्रशासन द्वारा यहां गौशाला की स्थापना कर गोबर गैस, वर्मी खाद एवं गौमूत्र से पेस्टीसाइट तैयार किए जाने की भी योजना है। चाय बागान के लिए पौधे तैयार करने के लिए यहां नर्सरी भी लगाई गई है।

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