त्रिवेणी संगम: महानदी-सोढ़ूर-पैरी

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माघ मेला- राजिम के ऐतिहासिक माघ पूर्णिमा का मेला पूरे भारत में प्रसिध्द है। इस पवित्र नगरी के एतिहासिक और पुरातात्विक महत्व के मन्दिरों में प्राचीन संस्कृति और शिल्पकला का अनोखा समन्वय नजर आता है। 14 वीं शताब्दी में बना ‘भगवान रामचंद्र का मन्दिर’, जगन्नाथ मन्दिर, भक्तमाता राजिम मन्दिर, और सोमेश्वर, महादेव मंदिर, श्रृध्दालुओं के लिए आस्था और विश्वास का केन्द्र है।
संगम स्थल – राजिम में महानदी, और पैरी और सोंढूर नदी नामक नदियों का संगम है। संगम स्थल पर कुलेश्वर महादेव का मन्दिर है, जो इतना सुदृढ़ है कि सैकड़ों वर्षों से नदी के निरंतर प्रवाह के थपेड़े सहता हुआ अडिग खड़ा हुआ है। राजिम या राजिव का प्राचीन नामांतर पद्यक्षेत्र भी कहा जाता है। पद्मपुराण, पातालखण्ड में श्री रामचन्द्र का इस स्थान (देवपुर) से संबंध बताया गया है।
1. महानदी – महानदी मध्य भारत के मध्य छत्तीसगढ़ राज्य की पहाडिय़ों में सिहावा के पास से निकलती है। नदी को उडि़सा का शोक भी कहा जाता है, जिसका कारण इसकी बाढ़ और सुखा से ग्रसित रहा है। यह नदी छत्तीसगढ़ राज्य की गंगा भी कही जाता है। इस नदी के द्वारा 58.48 प्रतिशत क्षेत्र का जल संग्रहण किया जाता है। महानदी नदी का उपरी प्रवाह उत्तरी की ओर महत्वहीन धारा के रूप में होता है और छत्तीसगढ़ मैदान के पूर्वी हिस्से को अपवाहित करता है। बालोदा बाजार के नीचे शिवनाथ नदी के इससे मिलने के बाद यह पूर्व दिशा में मुड़कर उडि़सा राज्य में प्रवेश करती है और उत्तर व दक्षिण में स्थित पहाडिय़ों को अप्रवाहित करने वाली धाराओं से मिलकर इसके बहाव में वृध्दि होती है। संबलपुर में इस नदी पर निर्मित हीराकुंड बॉध फलस्वरूप 55 किलोमीटर लम्बी कृत्रिम झील का निर्माण हो गया है। इस बॉध में कई पनबिजली संयंत्र है। बॉध के बाद महानदी दक्षिण में घुमावदार रास्ते होते हुए वनाच्छादित महाखण्ड के जरिये पूर्वी घाट को पार करती है। पूर्व के मैदान में यह कटक के पास उडि़सा के मैदान में प्रवेश करती है और कई धाराओं के माध्यम से फाल्स पाइन्ट के पास बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है। महानदी की कुल लम्बाई 900 किलोमीटर है और इसका अनुमानित अपवाहित क्षेत्र 132,100 वर्ग किलोमीटर है। यह भारतीय उपमहाद्वीप में सर्वाधिक सक्रिय गाद जमा करने वाली नदियों में से एक है। यह नदी सिंचाई की कई नहरों को, विशेेेषकर कटक के पास, जल प्रदान करती है। इसके एक मुहाने पर स्थित पुरी एक विख्यात तीर्थस्थल है। महानदी को मुख्यत: तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है
उपरी महानदी बेसिन
इसका अधिकांश भाग बस्तर तथा रायपुर में है। सिहावा पर्वत से निकलकर एक संकरी घाटी से होती हुई उत्तर-पश्चिम की ओर लगभग 50 किलोमीटर दूर तक प्रवाहित होकर बस्तर में कांकेर के निकट स्थित पानीडोंगरी पहाडिय़ों तक पहुॅचाता है। यहॉ यह पूर्व की ओर हो जाती है। यहॉ पर एवं तेल नदी जिले के दक्षिणी भाग का जल एकल कर महानदी में डालती है। बस्तर से नदी की लम्बाई 65 किलोमीटर तथा प्रवाह में क्षेत्र 2,640 वर्ग किलोमीटर है।
मध्य महानदी बेसिन – इसके अंतर्गत दुर्ग, मध्य रायपुर और बिलासपुर जिले का कुछ भाग सम्मिलित है। यह सम्पूर्ण क्षेत्र महानदी की प्रमुख सहायक शिवनाथ नदी का जलसंग्रहण क्षेत्र है, जिसमें उत्तरी-पश्चिमी एवं दक्षिणी सीमान्त उच्च भूमि से निकलने वाली सभी नदियॉ एवं नाले आकर मिलते है। शिवनाथ नदी रायपुर जिले में शिवरीनारायण से उपरी किरौन्जी नामक स्थान में पश्चिम से आकर महानदी में मिलती है। जमुनिया तथा खोरसी नदी दक्षिण से आकर मिलती है।
निचला महानदी बेसिन – इसके अंतर्गत बिलासपुर, रायपुर तथा रायगढ़ जिले आते है। शिवनाथ महानदी के संगम स्थल से महानदी एक तीव्र मोड़ लेकर बिलासपुर और रायपुर जिलों के मध्य तथा रायगढ़ तथा सारंगढ़ तहसील के मध्य एक प्राकृतिक सीमा बनाती है, जो पूर्वी ढलान की ओर प्रवाहित मध्य प्रदेश से बाहर निकल जाती है। इस क्षेत्र में उत्तर की ओर हसदो, मॉड एवं ईब नदियॉ तथा दक्षिण की ओर से जोंक एवं सुरंगी आकर मिलती है। रायपुर जिले में नदी की लंबाई 192 किलोमीटर तथा प्रवाह क्षेत्र 8,550 वर्ग किलोमीटर है।
पैरी नदी – पैरी नदी महानदी की प्रमुख सहायक नदी है। इसका उद्गम छत्तीसगढ़ राज्य के रायपुर जिले की गरियाबंद तहसील की बिन्दानवागढ़ जमींदारी में स्थित 500 मीटर उॅची अत्ररीगढ़ पहाड़ी से हुआ है।
उद्गम तथा प्रवाह – अपने उद्गम स्थल से निकलने के बाद यह नदी उत्तर-पूर्व दिशा की ओर करीब 96 कि.मी. बहती हुई राजिम क्षेत्र में महानदी से मिलती है। पैरी नदी धमतरी और राजिम को विभाजित करती है। इसी नदी के तट पर प्रसिध्द राजीवलोचन मंदिर स्थित है। राजिम में महानदी और सोंढूर नदियों का त्रिवेणी संगम स्थल भी है। इस नदी की लम्बाई 90 कि.मी. तथा प्रवाह क्षेत्र 3,000 वर्ग मीटर है।
सोंढूर नदी – सोंढूर नदी भारत में प्रवाहित होने वाली नदी है। महानदी, पैरी नदी तथा सोंढूर नदी का संगम छत्तीसगढ़ राज्य के राजिम शहर के पास पांडुका से 15 किमी दूर गरियाबंद मार्ग पर मालगॉव मुहैरा के निकट होता है। इस संगम से दोनों नदियों का जलकोश व्यापक हो जाता है।
1. सोंढूर नदी को पूर्व में सुन्दराभूति नदी के नाम से जाना जाता है।
2. महानदी, पैरी नदी और सोंढूर नदी का संगम होने के कारण ही राजिम को छत्तीसगढ़ का प्रयाग कहा जाता है।
3. पांडुका से 3 कि.मी. दूर ग्राम कुटेना से सिरकट्टी आश्रम के पास पैरी नदी एवं सोंढूर नदी के तट पर कठोर पत्थरों की चट्टानों को तोड़कर यहॉ एक बन्दरगाह बनाया गया था।
4. पहले सोंढूर और पैरी नदी के संगम स्थल मॉलगॉव में व्यापार के लिए माल का संग्रहण किया जाता था और इसी आधार पर इस गॉव का नाम मालगॉव पड़ गया था।
5. पैरी नदी का जल प्रवाह मध्यम होने से इसकाल जल निर्मल है और सोंढूर नदी का जल प्रवाह तीव्र होने के कारण इसका जल मटमैला दिखलाई पड़ता है। यहाू तक कि वर्षों ऋतु में इन दोनों नदियों की अलग-अलग रंग की धारायें स्पष्ट दिखाई पड़ती है।
6. वर्र्षा के मौसम में ज्यादा बारिश होने पर धमतरी जिले में महानदी, खारून, पैरी, बारूका और सोंढूर नदियों के तटवर्ती गांवो में बाढ़ का खतरा पैदा हो जाता है। नदियों के उफान पर आते ही तटवर्ती गांवों में मुनादी करानी पड़ती है।

मेलों का महीना- माघ
माघ का महीना यानी मेलों का महीना। इस महीने में पूरे देश में मेलों की रौनक छायी रहती है। कुछ खास मेलों और उनकी खासियत के बारे में..
प्रयाग का माघ मेला
उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद नगर में लगने वाला यह मेला विश्व का सबसे बड़ा मेला माना जाता है। तीन पवित्र नदियों गंगा, यमुना और आदि सरस्वती के संगम पर बसे ”तीर्थराज प्रयागÓ में प्रत्येक वर्ष जनवरी-फरवरी माह में विश्व प्रसिद्ध माघ मेला आयोजित होता है।
गोरखनाथ धाम का खिचड़ी मेला
उत्तर प्रदेश के सुप्रसिद्ध गोरखनाथ मंदिर में दुनियाभर में विख्यात एक माह ”खिचड़ी मेलाÓ लगता है। बाबा गोरखनाथ ने खिचड़ी बनाने की परंपरा शुरू की थी।
उत्तरकाशी का माघ मेला
इस मेले का शुभारंभ पाटा-संगाल्री गांवों से कंडार देवता और अन्य देवी देवताओं की डोलियों के उत्तरकाशी पहुंचने के साथ होता है। इस मौके पर लोग भागीरथी में स्नान को जुटते हैं।
पौड़ी गढ़वाल के गिंदी मेले
पौड़ी गढ़वाल में एकेश्वर, डाडामंडी, थलनाड़ी आदि जगहों पर माघ मास में ”गिंदी मेलोंÓ का भी आयोजन होता है। इन मेलों में शामिल होने के लिए दूर-दूर से युवा खिलाड़ी आते हैं। गांव के मध्य एक मैदान में एकजुट प्रतिभागी दो हिस्सों में बंट जाते हैं। फिर दोनों पक्षों के लोग एक डंडे की मदद से गेंद को अपने पाले में डालने की कोशिश करते हैं। इस खेल को एक तरह की पर्वतीय हॉकी कहा जा सकता है। कुमाऊं में यह खेल गिर के नाम से लोकप्रिय है।
गंगासागर मेला
माघ मास के प्रथम दिन पश्चिम बंगाल में मेले का आयोजन कोलकाता के निकट हुगली नदी के तट पर ठीक उस स्थान पर किया जाता है, जहां पर गंगा बंगाल की खाड़ी में मिलती है। इसीलिए इस मेले का नाम गंगासागर मेला है।
उड़ीसा का हरिबोल मेला
उड़ीसा राज्य के कोणार्क नगर के समीप समुद्र तट पर प्रतिवर्ष माघ मास में शुक्ल पक्ष की सप्तमी को लगने वाले हरिबोल मेले की भी काफी मान्यता है।
राजिम मेला
राजिम मेला माघ पूर्णिमा से लेकर महाशिवरात्रि तक पन्द्रह दिनों के लिए माघ मास में लगने वाला भारत का एक अन्य प्रमुख मेला छत्तीसगढ़ की धार्मिक राजधानी राजिम मेला है।
चम्पारण मेला
चम्पारण, रायपुर जिले का एक ग्राम है। माघ पूर्णिमा के अवसर पर मेले का आयोजन किया जाता है। यहाँ वल्लभाचार्य का जन्म हुआ था।
शिवरीनारायण का प्रसिद्ध माघ मेला
शिवनाथ, जोंक नदी और महानदी के पावन संगम पर शिवरीनारायण का प्रसिद्ध माघ मेला भी छत्तीसगढ़ की समृद्ध संस्कृति का प्रतीक है। महानदी के तट पर बौद्ध, जैन, शैव और वैष्णव संस्कृतियों के संगम स्थल के रूप में सिरपुर की पहचान छत्तीसगढ़ के एक मूल्यवान ऐतिहासिक धरोहर के रूप में है।
दामाखेड़ा-
दामाखेड़ा छत्तीसगढ़ में कबीर पंथ का प्रमुख आस्था केन्द्र है, जहां हर साल माघ शुक्ल दशमी से छह दिवसीय संत-समागम का आयोजन किया जाता है।

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