पाइक विद्रोह स्मारक स्थल

राष्ट्रीय विशेष

खोरधा की इस पवित्र धरती से, यहाँ के पाइकअ विद्रोहियों ने अन्याय के विरुद्ध जब शस्त्र उठाया तो उनका युद्धघोष था ‘जय जगन्नाथ’।
इस क्षेत्र के खेतिहर योद्धाओं को पाइकअ कहा जाता था। वे ऐसे किसान थे जिनमें युद्ध करने का कौशल और साहस होता था। उन्हें राजा द्वारा करमुक्त जमीन दी जाती थी जिस पर खेती करके वे अपनी आजीविका चलाते थे। 19वीं सदी के आरंभ में अंग्रेजों ने इस क्षेत्र पर भी कब्जा कर लिया और उनकी मालगुजारी व्यवस्था का बोझ यहाँ के किसानों पर भी पड़ने लगा। स्वाभिमानी पाइकों ने विद्रोह कर दिया। खोरधा विद्रोह के महानायक जयी राजगुरु को बेरहमी से फांसी दी गयी। आज उस बलिदान के क्षेत्र में उपस्थित होकर, और उन शहीदों को याद करके हम सबका रोमांचित होना स्वाभाविक है।
जयी राजगुरु के वीरगति प्राप्त करने के बाद, अंग्रेजों ने सोचा होगा कि पाइकों के विद्रोह को उन्होंने कुचल दिया। परंतु विद्रोह की आग सुलगती रही जिसे बक्शी जगबंधु बिद्याधर ने अपने साहसी नेतृत्व से पाइकअ विद्रोह की ज्वाला का रूप दिया। 1817 में कंध जनजाति के लोगों ने बक्शी जगबंधु की सेना के साथ मिलकर अंग्रेजों पर भीषण हमला किया।
अंग्रेजों के अत्याचार के विरुद्ध लड़ने वाली सेनाओं में ओडिशा के इस क्षेत्र के सभी वर्गों के लोग जुड़ गए और पाइकअ विद्रोहियों का समर्थन किया। जय जगन्नाथ का घोष करते हुये भूस्वामी, किसान, आदिवासी, शिल्पकार, जुलाहे, कारीगर और मजदूर, सभी ने पाइकअ विद्रोहियों का साथ दिया और इस तरह वह विद्रोह एक व्यापक आंदोलन बन गया।
यद्यपि अंग्रेज़ उस आंदोलन को दबाने में सफल रहे और बक्शी जगबंधु कारावास में शहीद हुए लेकिन वह विद्रोह एक सुसंगठित आंदोलन के रूप में अमर हो गया। सन 2017 में उस आंदोलन के 200 साल पूरा होने के उपलक्ष में भारत सरकार ने बड़े पैमाने पर अनेक समारोह किए।

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