विकास परख अगस्त अंक प्रकाशित

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ओलंपिक में भारत

टोक्यो में ओलंपिक खेलों का आयोजन चल रहा है। कोविड-19 के चलते इस साल भी ओलंपिक खेल के आयोजन पर संकट के बादल थे। जापान में अनेक संगठन ओलंपिक खेलों को रद्द करने की मांग कर रहे थे, लेकिन वहां की सरकार हर हाल में सुरक्षित ओलंपिक के आयोजन कराना चाहती थी। सो यह आयोजन सफलतापूर्वक चल रहा है। अभी तक चीन सर्वाधिक गोल्ड मेडल जीतकर अंक तालिका के उपर है। कभी सोवियत संघ और अमेरिका के बीच में कांटे की टक्कर हुआ करती थी। ज्यादातर अमेरिका ही पदक तालिका सर्वोच्च स्थान पर रहता था। 199० में शीत युद्ध के समाप्त होते ही सोवियत संघ का विखण्डन हो गया और अब रुस ओलंपिक खेलों में काफी पिछड़ गया है। उसका स्थान अब चीन ने ले लिया है, यूं कहें कि अब चीन ने ओलंपिक खेलों में अपना दबदबा बना लिया है। ऐसा बीजिंग ओलंपिक के बाद पुरजोर तरीके से हुआ है। जो देश ओलंपिक खेलों का आयोजन करता है, उसे इसका लाभ भी मिलता है। जैसे जापान में हो रहे है इस आयोजन में जापान दूसरे या तीसरे नंबर पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा है। खेल आयोजन के समापन के दिन भी स्पष्ट होगा कि टोक्यो ओलंपिक का सिरमौर कौन देश बनेगा। जहां तक भारत की बात है तो अंग्रेजों के गुलामी के समय से भारत ओलंपिक खेलों में हिस्सा लेता रहा और 1928 के बाद लगातार हॉकी के खेल का स्वर्ण पदक स्वतंत्रता प्राप्ति तक भारत की झोली में आता रहा। स्वतंत्रता के बाद देश विभाजन के चलते हॉकी में भारत का दबदबा कम होता गया। इसके पीछे खेल के नियमों और तकनीक में व्यापक परिवर्तन भी था। लेकिन पिछले दो दशकों में भारत ओलंपिक खेलों की तालिका में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा है। इस साल भी अब तक एक रजत पदक के साथ दो कांस्य पदक हासिल कर चुका है। अभी अनेक खेलों में भारत की उम्मीद बरकरार है। स्थिति में सुधार अवश्य हो रहा है, लेकिन भारत को ओलंपिक खेल में अपना दबदबा बनाने के लिए बहुत परिश्रम और व्यवस्था की आवश्यकता है। भारत में खेलने कूदने को समय की बरबादी मान ली जाती है। एक कहावत है- खेलो-कूदोगे तो होंगे खराब, पढ़ो लिखोगे तो बनोगे नवाब। और बात सही भी थी। खिलाडिय़ों को अपना जीवन देने के बावजूद आर्थिक, सामाजिक रुप से कुछ हासिल नहीं होता था। एक समय अच्छे खिलाड़ी सरकारी नौकरियों में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी का पद बड़ी मुश्किल से ले पाते थे। क्रिकेट का खेल लोकप्रिय हुआ क्योंकि इसमें खिलाडिय़ों को अच्छा पैसा मिलने लगा तो माता-पिता भी अपने बच्चों को इस खेल के लिए प्रोत्साहित करने लगे। अन्य खेलों के साथ ऐसा नहीं हो सका। कबड्डी, बैंडमिंटन और हॉकी जैसे खेलों में व्यवसायिक आयोजन होने से खिलाडिय़ों को फायदा हुआ है। जब खिलाडिय़ों को खेलने से पैसे मिलेंगे तो निश्चित योग्य खिलाड़ी पुरी मेहनत से देश के लिए पदक लाने में जुटेंगे। अभी तक खेल एक पार्ट टाइम कार्य है। भारत को दुनिया की ताकत बनना है तो सामरिक और आर्थिक के साथ खेलों में भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपना स्थान बनाना होगा।

 

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