विकास परख जुलाई अंक प्रकाशित

छत्तीसगढ़ राष्ट्रीय समसामयिक

Parishisht-Page-1

किसी विद्वान का कथन है कि जो पीढ़ी अपने इतिहास को भूल जाती है, उसका न तो अतीत होता है न ही भविष्य। यही कारण है कि समाज अपने पूवर्जों को स्मरण किसी न किसी रुप में रखता है। देश की विभूतियां जिन्होंने अपना तन-मन-धन सबकुछ देश को स्वतंत्र कराने और उसके भविष्य के निर्माण के लिए अपना सर्वस्व न्यौछवर कर दिया हो, जिन्हें अपने वर्तमान में कोई अपेक्षा नहीं थी, क्योंकि वे देश का सुनहरा भविष्य देखना चाहते थे। ऐसे महापुरुषों को भुला देना वर्तमान और भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं है। स्वतंत्रता संघर्ष में सम्पूर्ण देश के कोने-कोने में हर समाज, वर्ग के लोगों ने अपना सहयोग दिया है। हजारों की संख्या में लोग शहीद हुए, जो शहीद नहीं हुए उन्होंने लंबा समय जेल की सलाखों के पीछे काट दिया। इनकी तब यह अपेक्षा नहीं थी कि भविष्य इनको याद रखे लेकिन तब के भविष्य और आज वर्तमान उनका स्मरण अवश्य करे। 18 जून को पं. माधव राव सप्रे की 15०वीं जयंती थी। पं. सप्रे छत्तीसगढ़ में सामाजिक और राजनैतिक अलख जगाने वाले प्रथम पंक्ति के नेता थे। उन्होंने छत्तीसगढ़ का प्रथम समाचार पत्र छत्तीसगढ़ मित्र का प्रकाशन पेंड्रा नामक एक छोटे से कस्बे से किया। पं. सप्रे सन 19०० में छत्तीसगढ़ की कल्पना करते थे। यह संयोग ही कहा जाएं कि ठीक 1०० वर्ष बाद छत्तीसगढ़ एक पृथक राज्य के रुप में वर्ष 2००० में स्थापित हुआ। लेकिन समाज और राजनीति जिसको जगाने के लिए उन्होंने अपना जीवन लगाया दोनों ने ही पं. सप्रे को भुला दिया। केवल माधव राव सप्रे की बात नहीं है, उस काल के नारायण राव मेघावाले, वामनराव लाखे, पं. सुंदरलाल शर्मा, ठाकुर प्यारेलाल सिंह, डॉ. खूबचंद बघेल सहित जनजातीय संघर्षों के नेता, आज की पीढ़ी इनके बारे में ज्यादा कुछ नहीं जानती है। कुछ नेताओं के नाम से राज्य सम्मान स्थापित हो गए हैं। तो कम से कम उनका नाम लोगों ने सुना है। कुछ महापुरुषों के नाम से मार्ग, भवन या योजना संचालित है। इसलिए उनका नाम भी लोग सुनते या पढ़ते है। लेकिन ऐसी बहुत बड़ी संख्या ऐसे नेताओं की जिनका योगदान किसी से कम नहीं है। मगर उनके नाम से न तो कोई सम्मान है, न मार्ग, न भवन ऐसे महापुरुषों के नाम से योजना संचालित करना तो दूर बड़े शहरों के चौक-चौराहों पर इनकी मूर्तियां तक नहीं लगी है। सरकारी स्कूलों का नामकरण इन विभूतियों के नाम पर हुआ। लेकिन सरकारी स्कूलों की हालत इतनी खराब हो गई कि इनका नाम उन स्कूलों के साथ सम्मान से नहीं लिया जाता है। वर्ष 2०22 में भारत अपनी स्वतंत्रता के 75 वर्ष पूरे कर रहा है। जिसे केंद सरकार अमृत महोत्सव के रुप में मना रही है। प्रदेश सरकार को भी चाहिए कि इस महान अवसर पर प्रदेश के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों एवं समाज के लिए काम करने वाले महापुरुषों की स्मृति में एक कार्यक्रम कैलेण्डर बनाएं और स्कूल और महाविद्यालय स्तर पर नियमित कार्यक्रम कर नई पीढ़ी से उनका परिचय कराएं। यह उन विभूतियों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का सही तरीका होगा और उन्हें श्रद्धांजलि देने का भी। इसमें केवल शासन नहीं अपितु अकादमिक समाज भी अपनी भूमिका निभाएं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *