विकास परख जून अंक प्रकाशित

छत्तीसगढ़ छत्तीसगढ़ राष्ट्रीय समसामयिक

निराश ना हों
कोरोना महामारी के चलते पिछले 14 महीनों से पूरी दुनिया अस्त-व्यस्त है। इस बीमारी के चलते लोग भयभीत हैं। खासकर पहली और दूसरी लहर ने लोगों की जान ली और मानसिक रुप से थका दिया है। इसका सबसे ज्यादा असर उन युवाओं पर पड़ रहा है जो अपना भविष्य बनाने की दहलीज पर खड़े हैं। जैसे पिछले वर्ष 11वीं और 12वीं के विद्यार्थी, महाविद्यालयों में दूसरे और तीसरे वर्ष के विद्यार्थी इसी तरह जो प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले उम्मीदवार है वे भी कोरोना संक्रमण से प्रभावित हैं। केंद्र सरकार हो या राज्य सरकार सभी की प्राथमिकता अभी कोरोना महामारी से लोगों की जान बचाने की है। स्वास्थ्य सुविधाएं कैसे बेहतर हों इस पर सबका ध्यान है। स्वाभाविक है कि स्वास्थ्य सेवाओं में सरकार का पैसा खर्च हो रहा है, दूसरी ओर बार-बार लॉकडाउन होने से उद्योग और व्यापार प्रभावित है। इनसे सरकारों के राजस्व में कमी आ रही है। परिणामस्वरुप सरकारी सेवाओं में भर्ती की सभी प्रक्रियाएं लगभग ठप्प पड़ गई है। छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग और व्यापमं की अनेक परीक्षाएं या तो स्थगित है या उनका विज्ञापन जारी नहीं हो पा रहा है। राज्य सेवा परीक्षा और वन सेवा परीक्षा भी लटक गई है। स्वाभाविक है जो उम्मीदवार कड़ी मेहनत से इन पदों को पाने की लालसा रखते हैं, उनके हाथ अभी कुछ आता दिख नहीं रहा है। लेकिन यह समय निराशा का नहीं है, यह मान ले कि इस समय के कुचक्र में केवल विद्यार्थी ही नहीं फंसे हैं, निजी उद्योगों, व्यापारियों के यहां नौकरी करने वाले, छोटे कारोबारी, ठेले, खोमचे लगाकर अपना जीवनयापन करने वाले यहां तक कि दिहाड़ी मजदूरों को भी काम नहीं मिल रहा है, सभी प्रभावित हैं। महात्मा गांधी ने कहा था- ‘हमें अपनी वर्तमान परिस्थिति से निराश होने के बजाय अपने से कमजोर लोगों को देखें और समझें कि हम उनसे बेहतर स्थिति में है।Ó इसलिए विद्यार्थियों को निराश ना होकर इस समय का सदुपयोग करना चाहिए। कई कार्य जीवन में ऐसे हैं जिनको करने के लिए जीवन में कभी समय नहीं मिलता है करने पर कोई आर्थिक लाभ भी नहीं होता, इसलिए कुछ जरुरी कार्य हम चाहकर भी नहीं करते। इच्छा सबकी रहती है, जैसे भागवत गीता, वेद पुराण जैसे धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन करना या समाज की सेवा करना और नहीं तो अपनी रुचि का काम करना। इस समय जब सबकुछ ठहरा हुआ सा लग रहा है तब हमें अपने ऐसे कार्यों को प्रारंभ कर देना चाहिए। आध्यात्मिक ज्ञान के लिए किसी विशेष आयु की आवश्यकता नहीं है। इनका अध्ययन करने से आत्मबल भी बढ़ता है और अपनी संस्कृति, धर्म के प्रति हम जागरुक होते हैं। ऐसे अध्ययन का लाभ आगे चलकर किसी भी कार्य करते समय मिल सकता है। युवाओं से यही अनुरोध कि समय का सदुपयोग करें अपने मन का कार्य करें और निराशा से बचें। क्योंकि कहते हैं- मन के हारे हार, मन के जीते जीत।

 

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