विकास परख सितंबर अंक प्रकाशित

छत्तीसगढ़ छत्तीसगढ़ राष्ट्रीय राष्ट्रीय समसामयिक

कृषि में सुधार
छत्तीसगढ़ एक कृषि प्रधान राज्य है, जहां कुल आबादी में 8० प्रतिशत या 35 लाख परिवार की आजीविका कृषि पर निर्भर है। इसमें 7० प्रतिशत किसान सीमांत या छोटे हैं, जिनके पास औसत भूमि का रकबा एक से डेढ़ एकड़ है। छत्तीसगढ़ रंगराजन समिति के अनुसार गरीबी रेखा के पैमाने पर सबसे निचले पायदान पर है। इसका कारण मौसम आधारित कृषि पर निर्भरता और कृषकों के छोटे जोत हैं। राज्य बनने के बाद न्यूनतम समर्थन मूल्य पर धान खरीदने की सरकारी व्यवस्था बनी और यह सुचारू रुप से चली। जहां 2००1-०2 में सरकार बीस से पच्चीस लाख टन धान खरीदती थी। वह 2०2० के आते-आते 7० लाख टन को पार कर गया है। इसका मतलब है कि प्रदेश में धान का उत्पादन भी तीन से चार गुना बढ़ा है। इसके साथ-साथ सार्वजनिक वितरण प्रणाली से 35 लाख परिवारों को एक रुपए किलो चावल देने की योजना शुरु हुई। यह दोनों योजना एक दूसरे के विपरीत है। कृषि प्रधान राज्य में जहां तीन चौथाई आबादी खुद का अनाज पैदा करती हो, उसे सस्ती दर पर चावल उपलब्ध कराना क्यों जरुरी है? लेकिन छत्तीसगढ़ की यह जरूरत है और कारण वही ज्यादातर किसान छोटे है इसलिए उनकी पैदावर उनके सालभर के भरण-पोषण के लिए पर्याप्त नहीं है। पिछले दो-तीन वर्षों से भूपेश बघेल सरकार 25०० रु. क्विंटल की दर से धान खरीद रही है, लेकिन यह मान लेना कि इससे प्रदेश की गरीबी दूर हो जाएगी तो सही नहीं होगा। कारण वही है कि ज्यादातर किसान जिनका रकबा एक-दो एकड़ है और धान की उत्पादकता 25 क्विंटल प्रति एकड़ भी मान ले तो ज्यादातर किसान 5० क्विंटल धान पैदा करते है, जिनमें से 3० क्विंटल ही समिति के माध्यम से सरकार 25०० रु. की दर से खरीदती है। परिवार की कुल कृषि सकल आय न्यूनतम समर्थन मूल्य के आधार पर 75 हजार है। इसमें खेती करने में लागत मूल्य भी जुड़ा हुआ है, उसे हटा देने पर एक सीमांत किसान को बमुश्किल 25-3० हजार रुपए प्रति वर्ष का लाभ कृषि से होता है। इससे उसका गुजारा नहीं चलता इसलिए उसे मनरेगा और अन्य संस्थानों में मजदूरी का काम करना पड़ता है। धान की खरीदी की दर अच्छी होने के कारण ज्यादातर किसान धान उत्पादन करने में जोर दे रहे हैं। अब छोटे जोत वाले किसानों को मिलाकर बड़ा रकबा बना दिया जाए और रकबाधारी किसानों को सामुहिक रुप से उसमें खेती करने के लिए प्रेरित किया जाए तो यह सहकारी मॉडल लाभकारी हो सकता है। सहकारिता 2०वीं शताब्दी के प्रारंभ में एक वरदान के रुप में शुरु हुई लेकिन स्वतंत्रता के बाद यह राजनेताओं के चंगुल में जा फंसी। सहकारिता आंदोलन के जरिए विधायक, सांसद और मंत्री बहुत बने लेकिन किसानों का भला नहीं हुआ। हाल में केंद्र सरकार ने सहकारिता मंत्रालय का गठन किया और गृहमंत्री अमित शाह को उसकी जिम्मेदारी दी है। एक बार फिर सहकारिता आंदोलन को मजबूत करने और इसका लाभ छोटे किसानों तक पहुंचाने की आवश्यकता है। देश में गरीबी एक अभिशाप है और अन्नदाता भूखा रहे यह तो गजब की विसंगति है।

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