छत्तीसगढ़ की वीर भूमि- सोनाखान

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सोनाखान जोंक नदी के दक्षिण में एक कि.मी. दूरी पर राजधानी रायपुर से लगभग 150 कि.मी. की दूरी पर यह ऐतिहासिक ग्राम स्थित है। सोनाखान ब्रिटिश काल में एक छोटी जमींदारी थी। यह पर्वत श्रृंखलाओं से घिरा हुआ एवं सागौन के जंगलों से अच्छादित यह पुण्य स्थली है। यह जमींदारी प्रारंभ में रायपुर जिले में तत्पश्चात बिलासपुर जिले में स्थानांतरित हुई तथा बलौदा बाजार तहसील का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है। यह बिलासपुर से 75 कि.मी. दूर दक्षिण पूर्व में स्थित है तथा शिवरीनारायण से 25 कि.मी. दूरी पर स्थित है।

ब्रिटिश नियंत्रण में जमींदारी क्षेत्र

सन् 1818 में छत्तीसगढ़ ब्रिटिश नियंत्रण में आ चुका था। सन् 1855 में डिप्टी कमिश्नर इलियट ने सोनाखान क्षेत्र का अवलोकन किया था। 10 जून, 1855 को शासन को प्रेषित अपनी रिपोर्ट में लिखा था, सोनाखान में 12 गांव शामिल माने जाते है और यहां से 308 रूपये आने का राजस्व जमा होता है, यहां से टकोली का भुगतान नहीं होता । उन्होंने अपनी रिपोर्ट में भी लिखा कि यह वर्तमान अधिपति नारायण सिंह जी बिंझवार राजपूत है एवं उनके परिवार के अधिकार में पिछले 366 वर्षो से है। इस जमींदारी में किसी प्रकार का कर नहीं लगाया गया था। मराठा काल में (बिम्बाजी भोसले के राजस्व कार्योलय में) सोनाखान में इमारती लकड़ी एवं लाख की पूर्ति (वार्षिक) भोसले को दी जाती थी। वह 1224 फसली तक चलता रहा। बाद में वर्तमान जमींदारी के पिता रामसायक के समय यह क्षेत्र अंग्रेजों के नियंत्रण में तथा पट्टे में नया संशोधन किया गया था। जिसके अंतर्गत लकड़ी एवं लाख के वार्षिक भुगतान को समाप्त कर दिया गया, क्योंकि जमींदार ने प्रार्थना की थी कि ऐसी कोई शर्त पट्टे में उल्लेखित नहीं कि। उसने 300 रूपये नामनुक भी प्रदाय किया गया। देवनाथ मिश्र नामक ब्राम्हण के लिये नये कर्ज के फलस्वरूप उनके द्वारा तथाकथित अपमान किये जाने के कारण (देवनाथ से संबलपुर में सुरेन्द्र साय तथा उदयपुर के खूंखार शिवराज सिंह को पकड़वाने में प्रमुख भूमिका निभाई थी) कत्ल कर दिया गया। जमींदारी के जमींदार को उनकी रियासत में दी जाने वाली सुविधाएं समाप्त कर दी।

सोनाखान- भीषण सूखे की चपेट में

सन् 1856 में छत्तीसगढ़ प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित पूरा अंचल भीषण सूखे की चपेट में आ गया। सोने की खान में रहने वाले अमीर धरती के गरीब लोग दाने-दाने के मोहताज हो गये थे। माखन नामक एक अन्य व्यापारी था। जिसके पास अन्न का विशाल भंडार था। जमींदार नारायण सिंह को यह असह्य लगा कि एक तरफ गांव के लोग दाने-दाने के लिए तरस रहे है और दूसरी ओर यह व्यापारी जमाखोरी में लगा हुआ है। तब नारायण सिंह को अनाज व्यापारी ने इंकार कर दिया। फिर क्या था ? उसने सामने आकर गोदाम का ताला तोड़कर भूखे किसानों एवं मजदूरों को अनाज बांट दी। उसके इस पुनीत कार्य से नाराज व्यापारी माखन की शिकायत पर रायपुर के डिप्टी कमिश्नर इलियट ने सोना खान के जमींदार के जमींदार नारायण सिंह के विरूध्द वारंट जारी कर दिया। जगन्नाथपुरी के जमींदार का पीछा करने के लिए मुल्की घुड़सारी की एक टुकड़ी भेज दी गई और थोड़ी बहुत परेशानी के बाद तीर्थयात्रा के मार्ग पर संबलपुर में 24 अक्टूबर 1856 को गिरफ्तार कर लिया गया। इस गिरफ्तारी की सूचना कमिश्नर इलियट रायपुर द्वारा पत्र लिखकर नागपुर के कमिश्नर प्लाउइन की गई। इलियट ने अपने पत्र में सोनाखान के जमींदार नारायण सिंह के संदिग्ध चरित्र का उल्लेख करते हुए लिखा कि ये जमींदार कोई टकोली नहीं देता, बल्कि कंपनी के नाम से नामनुक बतौर 546 रूपये 4 आने 7 पैसे वार्षिक प्राप्त करना जमींदार नारायण सिंह का यह कृत्य कंपनी शासन अधिकारी के लिए चुनौती थी। इधर सोनाखान के ग्रामीण सूखे की चपेट में अन्न-अन्न के लिए तरस रहे थे। मवेश भी गांव छोड़कर चारे की तलाश में बाहर जा रहे थे। चारों ओर भूख व्याप्त होने से हाहाकार मचा हुआ था। गांव से लोग पलायन करने लगे थे कि उन्हें रोकने एवं अनाज की व्यवस्था करने में नारायण सिंह जुट गये। उन्होंने कुछ गांवों में एक बैठक बुलाई और तय हुआ कि कसडोल के मिश्रा परिवार से कर्ज में अनाज मांगा जाये, उसे ब्याज व अधिक मुनाफे के लालच में मिश्रा परिवार ने नारायण सिंह को अनाज देने से इंकार कर दिया।

वीर नारायण सिंह की ललकार

महाजन के कोठे से अनाज रखे-रखे सूखने लगा, तब नारायण सिंह ने पुनः गांव के मुखिया लोगों की बैठक बुलाई। गांव-गांव बैठके होती रहीं। लोग जुड़ने लगे तब नारायण सिंह ने कहा कि हमारे प्राण क्यों न चले जाये। नारायण सिंह ने इस ओजस्वी पूर्ण आवाहन् के जवाब में गांव वालों ने समवेत स्वर में कहा लड़बोन-लड़बोन यह स्वर इतना तेज था कि सारा इलाका इस स्वर से गुंज उठा। फलस्वरूप लोगों में जोश भर गया। वे आसपास के ग्राम वासियों के कदम सोनाखान की ओर बढ़ाने लगे कुर्रापाट में नारायण सिंह का डेरा था। कुर्रापाट का पानी पीकर मुखिया एवं सरदों से शपथ ली थी कि अब साहूकार के अत्याचार को सहन नहीं करेेंगे। पहली बार सोनाखान में एकत्र किसानों ने हथियार उठा लिये थे। साहूकार के विरूध्द एकत्र हो गये और नारायण सिंह के नेतृत्व में कसडोल की ओर कूच कर गये। नारायण सिंह ने साहूकारों के भण्डारों से अनाज जप्त कर भूखे किसानों में बांट दी। छत्तीसगढ़ इतिहास में यह ब्रिटिश कंपनी के शासन के विरूध्द ऐ पहली क्रांतिकारी घटना थीं नारायण सिंह का यह क्रांतिकारी कदम अंग्रेजों को पसंद नहीं आया उसे कानून का उल्लंघन मानकर ब्रिटिश कंपनी ने सोनाखान के जमींदार नारायण सिंह की चोरी एवं डकैती के जुर्म में कुछ साथियों के साथ बंदी बनाकर जेल में डाल दिया। सोनाखान के 18 गांव के आदिवासी किसान अपने इस नेता के विरूध्द इस कार्यवाही का विरोध करने लगे। इसी बीच सोनाखान के किसानों ने संभवतः के किसानों ने संभवतः संबलपुर के विद्रोही नेता एवं क्रांतिवीर सुरेन्द्र साय से संपर्क किया। इसकी मदद से रायपुर जेल से भाग निकालने की योजना बनाई गयी। रायपुर जेल में 10 माह चार दिन बंदी रहने के बाद रायपुर डिप्टी कमिश्नर ने नागपुर के कमिश्नर को सूचित किया कि 28, अगस्त 1857 को नारायण सिंह तीन अन्य साथियों के साथ जेल में सुरंग बनाकर सुरंग के रास्ते से भाग जाने की सूचना दी।

सोनाखान में विद्रोह –

वीरनारायण सिंह छत्तीसगढ़ के प्रथम किसान नेता थे। किसानों में चेतना का विकास कर उनमें ऊर्जा भरकर उन्हें संगठित किया और ब्रिटिश शासन से लोहा लेने के लिए सर्वप्रथम सोनाखान से शंखनाद किया। किसानों का मनोबल बढ़ता गया। सोनाखान के विद्रोह ने अंग्रेज शासन की नींव हिला दी। देखते ही देखते सोनाखान फौजी छावनी के रूप में बदल गया। जंगल के आदिवासियों की तीर-कमान एवं बंदूकों की झंकार सुनाई देने लगी। लेफ्टिनेंट स्मिथ की सैन्य टुकड़ी सोनाखान का चप्पा-चप्पा छान चुका था। नारायण सिंह सोनाखान के पहाड़ी रास्ते पहंुचकर जंगल के किसानों को संगठित करता। अंग्रेजों को इन मार्गो की जानकारी न हो से वे उसे रोकने में असफल हो गये। वे स्मिथ के कंपनी से और सैन्य टुकड़ी की मांग की तथा इस मार्ग भटगांव, बिलाईगढ़ व कटगी जमींदार से मदद मांगी। ये जमींदार कंपनी शासन के सहयोग के लिए आगे आये और स्मिथ से 26 से 29 दिंसबर 1857 को शस्त्र एवं बारूद इकठ्ठा करने हेतु विविध दल भेजे। रायपुर के ब्रिटिश कमिश्नर ने गंभीर स्थिति को भांपकर एक दिसंबर, 1857 के 100 सशस्त्र सैनिक भेजे। अंग्रेजों के दबाव से आसापास के जमींदार भी इस विद्रोह को दबाने के लिए संगठित हो गये थे। वीरनारायण सिंह के लिए अब ये जमींदारों की रीड़े बन गये थे। अंग्रेजों ने इसे उन पहाड़ी एवं जंगली मार्ग की जानकारी ली, जहां से वे वहां पहुंच सकते थे।

पराजय और शहादत

कटनी के जमींदार ने 2 दिसंबर 1857 को 40 सहयोगियों के साथ यहां आ पहुंचे तथा स्मिथ की सेना से आ मिलें आदिवासी जंगल से पेड़ों मे चढ़कर तीन कमान लेकर अंग्रेजी सेना को रोक देते थे। लगातार यह गुरिल्ला युध्द चलता रहा। इधर नारायण सिंह की सेना की गोलियां समाप्त हो गयी थी। देशी हथियारों से अंग्रेजी फौज का मुकाबला करना अब मुर्खता थी। नारायण सिंह ने सोनाखान से 10 कि.मी. दूर तोपों सहित अंग्रेजी सेना पर आक्रमण की योजना बनाई थीं, परन्तु देवरी के जमींदार महाराज साय द्वारा धोखा दिये जाने से योजना क्रियान्वित नहीं हो सकी। उसकी सेना पहाड़ी में यत्र-तत्र बिखर गई थी। उसकी शक्ति क्षीण होने लगी। अब नारायण सिंह ने अंग्रेजी सेना से और मुकाबला करना व्यर्थ समझा। बची हुई जनता के हिफाजत के लिये उसने दिसंबर 1987 को अपने एक साथी के साथ वीरता के ज्योति स्तंभ नारायण सिंह लेफ्टिनेंट स्मिथ के सामने पहंचे, किन्तु हथियार नहीं डाला। अंग्रेजी सेना ने चारों ओर से घेर लिया। बंदी नारायण सिंह गिरफ्तार की खबर मिलते ही आदिवासी संगठन बिखर गया। 5 दिसंबर को रायपुर डिप्टी कमिश्नर इलियट को सौंप दिया गया। इस प्रकार सोनाखान के वीर सपूत के गिरफ्तार से सोनाखान जमींदारी का सूर्यास्त हो गया।
छत्तीसगढ़ से डिप्टी कमिश्नर इलियट ने लिखा कि कोर्ट के समक्ष जमींदार को पेश किया गया। उस पर 1857 की सुबह फांसी की सजा (शंभू दयाल गुरू के अनुसार) जनलर परेड के समय सैनिक टुकड़ी के समक्ष दे दी गई। छत्तीसगढ़ के वीर सपूत ने हंसते-हंसते अपने गले में फंदा डालकर हमेशा के लिए विदा ले लिया।

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